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Sunday, August 27, 2023

पार्श्वनाथ प्रभु सवायो Parshwa prabhu Sawayo - Parshwanath song jain stavan

|| Parshwa prabhu Sawayo Devchandraji Jain stavan SONG ||
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 Parshwa prabhu Sawayo स्तवन सांग

जैन स्तवन


श्री पार्श्वनाथ भगवान् स्तवन Devchandraji jain stavan

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पार्श्वनाथ प्रभु सवायो Parshwa prabhu Sawayo
Devchandraji krut chovishi






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||  पार्श्वनाथ प्रभु सवायो Parshwa


 prabhu Sawayo ||  


सहज गुण आगरो स्वामी सुख सागरो; ज्ञान वईरागरो प्रभु सवायो;
शुद्धता एकता तीक्ष्णता भावथी, मोहरिपु जीती जय पडह वायो     ।।1।। 

वस्तु निज भाव अविभास नि:कलंकता, परिणति वृत्तिता करी अभेदे;
भाव तादात्म्यता शक्ति उल्लासथी, संतति योगने तुं उच्छेदे     ।।2।। 

दोष गुण वस्तुनो लखीय यथार्थता, लही उदासीनता अपर भावे;
ध्वंसि तज्जन्यता भाव कर्त्तापणुं, परम प्रभु तुं रम्यो निज स्वभावे     ।।3।। 

शुभ अशुभ भाव अविभास तहकीकता, शुभ अशुभ भाव तिहां प्रभु न कीधो;
शुद्ध परिणामता वीर्य कर्त्ता थई, परम अक्रियता अमृत पीधो     ।।4।। 

शुद्धता प्रभुतणी आत्मभावे रमे, परम परमात्मता तास थाये;
मिश्र भावे अछे त्रिगुणनी भिन्नता, त्रिगुण एकत्व तुज चरण आये     ।।5।। 

उपशम रसभरी सर्व जन शंकरी, मूर्ति जिनराजनी आज भेटी;
कारणे कार्य निष्पत्ति श्रद्धान छे, तिणे भव भ्रमणनी भीड मेटी     ।।6।। 

नयर खंभायते पार्श्व प्रभु दरशने, विकसते हर्ष उत्साह वाध्यो;
हेतु एकत्वता रमण परिणामथी, सिद्धि साधकपणो आज साध्यो     ।।7।। 

आज कृतपुण्य धन्य दीह माहरो थयो, आज नर जन्म में सफल भाव्यो;
देवचंद्र स्वामी त्रेवीशमो वंदीयो, भक्तिभर चित्त तुज गुण रमाव्यो     ।।8।।


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अर्थ 1 : प्रभु कैसे हैं? यह बताते हैं। सहज स्वाभाविक गुणों के धाम हैं, अव्याबाध, अविनाशी सुख के सिन्धु हैं, ज्ञानरुप वज्र-हीरा की खान है, सवाया-साद सर्वश्रेष्ठ हैं। ऐसे श्री पार्श्वनाथ भगवान् ने शुद्धता (सम्यग्ज्ञान की निर्मलता), एकता (स्वरुप तन्मयता) और तीक्ष्णता (वीर्यगुण की तीव्रता) के भाव द्वारा मोहशत्रु को जीतकर जय पडह-विजय का डंका बजाया है।

सहज गुण आगरो स्वामी सुख सागरो; ज्ञान वईरागरो प्रभु सवायो;
शुद्धता एकता तीक्ष्णता भावथी, मोहरिपु जीती जय पडह वायो     ।।1।।

अर्थ 2 : अब शुद्धता, एकता और तीक्ष्णता की व्याख्या बताते हैं। वस्तु के स्वरुप का यथार्थ ज्ञान, यह निशष्कलंकता शुद्धता है। आत्मपरिणति में वृत्ति का अभेद, यह एकता है और तादात्म्य भाव से रही हुई वीर्य-है।

वस्तु निज भाव अविभास नि:कलंकता, परिणति वृत्तिता करी अभेदे;
भाव तादात्म्यता शक्ति उल्लासथी, संतति योगने तुं उच्छेदे     ।।2।।

अर्थ 3 : वस्तु के गुण-दोषों की यथार्थता जानकर परभाव से उदासीन होकर और तदुत्पत्ति सम्बन्ध से उत्पन्न अर्थात् पुद्गल के सम्बन्ध से पेदा हुए विभाग-कर्तुत्व का नाश करके हे प्रभो! आप अपने परम शुद्ध स्वभाव में रमण कर रहे हैं।

दोष गुण वस्तुनो लखीय यथार्थता, लही उदासीनता अपर भावे;
ध्वंसि तज्जन्यता भाव कर्त्तापणुं, परम प्रभु तुं रम्यो निज स्वभावे     ।।3।।

अर्थ 4 : शुभ अथवा अशुभ भाव की यथार्थ (निश्चित) पहचान करके शुभ या अशुभ पदार्थों में हे प्रभो! आपने शुभाशुभ भाव अर्थात् राग-द्वेष नहीं किया परन्तु शुद्ध पारिणामिक-भाव में वीर्यगुण को प्रवर्तितकर परम अक्रियतारुप अमृतरस का पान किया है।

शुभ अशुभ भाव अविभास तहकीकता, शुभ अशुभ भाव तिहां प्रभु न कीधो;
शुद्ध परिणामता वीर्य कर्त्ता थई, परम अक्रियता अमृत पीधो     ।।4।।
अर्थ 5 : प्रभु की पूर्ण शुद्धता का जो जीव आत्म-स्वभाव में अभेद भाव से चिन्तर कर ध्यान द्वारा उसमें ही रमण करता है अर्थात् मेरी आत्मा भी सत्तारुप से पूर्ण शुद्ध स्वरुप है। ऐसा निश्चय कर प्रभु की पूर्ण शुद्धता में तन्म्य बनता है, उसे वैसी ही परम परमात्म-दिशा प्राप्त होती है। क्षयोपशमभाव में ज्ञान-दर्शन-चारित्र की भिन्नता मालूम होत है परन्तु क्षायिक यथाख्यात चारित्र प्राप्त होने पर तीनों गुणों की एकरुपता हो जाती है।

शुद्धता प्रभुतणी आत्मभावे रमे, परम परमात्मता तास थाये;
मिश्र भावे अछे त्रिगुणनी भिन्नता, त्रिगुण एकत्व तुज चरण आये     ।।5।।

अर्थ 6 : उपशम-सुधारस से परिपूर्ण और सर्व जीवों को सुख देनेवाली श्री जिनेश्वर प्रभु की मूर्ति के साक्षात्कार से अर्थात् आज उसके दर्शन-वन्दन-सेवन अपूर्व हर्षाोल्लास के साथ करने से ऐसी दृढ प्रतीति हो गई है कि, मोक्ष के पुष्ट-निमित्त कारणरुप जिनदर्शन और जिनसेवा का योग मिला है, उससे मोक्षरुप कार्य की सिद्धि अवश्य होगी। ऐसी दृढ प्रतीति होने के साथ ही मेरे भवभ्रमण का भय भी भाग गया (कारण में कार्य का उपचार करके हर्षावेश से निकला हुआ कवि का यह अनुभव वचन है)।

उपशम रसभरी सर्व जन शंकरी, मूर्ति जिनराजनी आज भेटी;
कारणे कार्य निष्पत्ति श्रद्धान छे, तिणे भव भ्रमणनी भीड मेटी     ।।6।।

अर्थ 7 : खम्भात नगर में बिराजमान श्री सुखसागर पार्श्वनाथ प्रभु के दर्शन-वन्दन करते समय रोमराजि विकसित होने के अपूर्व हर्ष और उत्साह की उर्मियां उत्पन्न होने लगी और श्री अरिहन्त परमात्मा के साथ ध्यान द्वारा तन्मयता सिद्ध होने से आत्म-रमणता प्राप्त हुई। इससे अनुमान होता है कि सिद्धि की साधकता मेरी आत्मा में प्रकटित हुई है।

नयर खंभायते पार्श्व प्रभु दरशने, विकसते हर्ष उत्साह वाध्यो;
हेतु एकत्वता रमण परिणामथी, सिद्धि साधकपणो आज साध्यो     ।।7।।

अर्थ 8 : देवों में चन्द्र समान समुज्जवल श्री पार्श्वनाथ प्रभु को भावपूर्वक वन्दन किया और भक्ति से भरपूर चित्त प्रभु के गुण में रमण करने लगा। इसलिए आज मेरा महान पुण्योदय जागृत हुआ है। आज का यह दिन धन्य बना है। और सचमुच ! आज मेरा यह जन्म भी सफल बन गया है।

आज कृतपुण्य धन्य दीह माहरो थयो, आज नर जन्म में सफल भाव्यो;
देवचंद्र स्वामी त्रेवीशमो वंदीयो, भक्तिभर चित्त तुज गुण रमाव्यो     ।।8।।



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MATUSHREE PAVANIDEVI AMICHANDJI KHATED SANGHVI 


JAINAM JAYATI SHASHNAM

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Mallinath Jagnath Thaye Nirabad Devchandraji chovisi stavan 19

|| Mallinath Jagnath Thaye Nirabad Devchandraji LYRICS - JAIN STAVAN SONG ||
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 Mallinath Jagnath Thaye Nirabad स्तवन स्तवन सांग

जैन स्तवन


श्री मल्लिनाथ भगवान् स्तवन Devchandraji jain stavan
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||  मल्लिनाथ जगनाथ निराबाधना ||  


श्री मल्लिनाथ जिन स्तवन

मल्लिनाथ जगनाथ चरणयुग ध्याईये रे,  च.
शुद्धताम प्राग्भाव परम पद पाईये रे; प.
साधक कारक षट्क करे गुण साधना रे, क.
तेहिज शुद्ध सरूप, थाय निराबाधना रे     ।।था.1।।

कर्ता आतम द्रव्य, कार्यनिज सिद्धतारे, का.
उपादान परिणाम, प्रयुक्त ने करणता रे; प.
आतम संपद दान तेह संप्रदानता रे, ते.
दाता पात्रने देय, त्रिभाव अभेदता रे     ।।त्रि. 2।।

स्व पर विवेचन करण तेह अपादानथी रे, ते.
सकल पर्याय आधार संबंध आस्थानथी रे; स.
बाधक कारक भाव, अनादि निवारवो रे, अ.
साधकता अवलंबी, तेह समारवो रे     ।।ते. 3।।

शुद्धपणे पर्याय प्रवर्तन कार्यमें रे; ते.
कर्तादिक परिणाम ते आतम धर्ममें रे; ते
चेतन चेतन भाव करे समवेतमें रे, क.
सादि अनंतो काल, रहे निज खेतमें रे     ।।र. 4।।

पर कर्तृत्व स्वभाव करे तां लगी करे रे, क.
शुद्ध कार्य रुचि भास थये नवि आदरे रे; थ.
शुद्धात्म, निज कार्य रुचे कारक फिरे रे, रु.
तेहिज मूल स्वभाव, ग्रहे निज पद वरे रे     ।।ग्र. 5।।

कारण कारज रुप, अछे कारक दशा रे।। अछे.।।
वस्तु प्रगट पर्याय, एह मनमें वस्या रे ।। एह.।।
पण शुद्ध स्वरुप ध्यान, चेतनता ग्रह रे।। चेतनता.।।
तव निज साधकभाव सकल कारक लहे रे।।     ।।स. 6।।

माहरुं पूर्णानंद, प्रकट करवा भणी रे।। प्रकट.।।
पुष्टालंबन रुप, सेव प्रभुजी तणी रे ।। सेव।।
'देवचंद्र' जिनचंद्र, भक्ति मनमे धरो रे ।। भक्ति.।।
अव्याबाध अनंत, अक्षय पद आदरो रे    ।।अ. 7।।



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अर्थ 1 : जगत् के नाथ श्री मल्लिनाथ परमात्मा के पाद-पद्म का ध्यान करने से शुद्ध परमात्म पद का प्रादुर्भाव होता है। क्योंकि श्री अरिहन्त प्रभु की सेवा से साधक के छहों कारक ज्ञानादि गुणों की साधना करते हैं और आत्मा का पूर्ण शुद्ध स्वरूप प्रकट होने पर वे ही षट्कारक निराबाधरुप में परिणत होते हैं।

मल्लिनाथ जगनाथ चरणयुग ध्याईये रे,  च.
शुद्धताम  प्राग्भाव परम पद पाईये रे; प.
साधक कारक षट्क करे गुण साधना रे, क.
तेहिज शुद्ध सरूप, थाय निराबाधना रे     ।।था.1।।
अर्थ 2 : (1) कर्ता : आत्मद्रव्य आत्मशुद्धिरूप कार्य में प्रवृत्त हुआ। यह प्रथम कर्ता कारक है। (2) कार्य : स्वसिद्धता (ज्ञानादि सर्व गुणों की पूर्णतारूप) कार्य – यह दूसरा कार्य (कर्म) कारक है। (3) कारण : उपादानपरिणाम, तत्त्वरूचि, तत्त्वज्ञान, तत्त्वपरिणति-तत्त्वरमणता, ये उपादान-कारण है और अरिहन्तादि निमित्त कारण हैं, इनका प्रयोग करना यह तीसरा करण कारक है। (4) संप्रदान : आत्मसम्पत्ति का दान अर्थात् ज्ञान, दर्शन, चारित्र का दान आत्मा स्वयं अपने उत्तरोत्तर गुण को प्रकट करने के लिए करे, यह चौथा सम्प्रदान कारक है। यहाँ दाता आत्मा है, पात्र भी आत्मा है और देय आत्मगुण है। इस प्रकार तीनों की अभेदता है।

कर्ता आतम द्रव्य, कार्यनिज सिद्धतारे, का.
उपादान परिणाम, प्रयुक्त ने करणता रे; प.
आतम संपद दान तेह संप्रदानता रे, ते.
दाता पात्रने देय, त्रिभाव अभेदता रे     ।।त्रि. 2।।
अर्थ 3 : (5) अपादान : स्व-पर की विवेक करना। जैसे, ज्ञानादि आत्मगुण ‘स्व’ है और रागद्वेषादि ‘पर’ है। ऐसा विचारकर उनका विवेक करना यह पांचवां अपादान कारक है। (6) आधार : समग्र स्व-पर्याय का आधार आत्मा है। आत्मा का स्वपर्याय के साथ स्व-स्वामित्वादि संबंध है, उसका आस्थान-आधार क्षेत्र आत्मा है। यह छठा आधार कारक है। अनादि से बाधकभाव से (मिथ्यात्व-अविरति-कषायादि में) परिणत षट्कारक के चक्र को रोककर साधकता के आलम्बन द्वारा ‘स्वरूप-अनुयायी’ बनाना चाहिए। जिससे सिद्धता-मोक्षरूप स्वकार्य की सिद्धि हो।

स्व पर विवेचन करण तेह अपादानथी रे, ते.
सकल पर्याय आधार संबंध आस्थानथी रे; स.
बाधक कारक भाव, अनादि निवारवो रे, अ.
साधकता अवलंबी, तेह समारवो रे     ।।ते. 3।।
अर्थ 4 : अब सिद्ध अवस्था में षट्कारक-प्रवृत्ति किस प्रकार है? यह बताते हैं -(1) कर्ता : शुद्ध ज्ञान-दर्शनादि पर्यायों को जानने-देखनेरूप कार्य का अथवा उत्पाद-व्ययरूप से परिणमन का कर्ता शुद्ध आत्मा है। (2) कार्य : शुद्ध ज्ञानादि पर्यायों को जानने-देखने ते र्ता में प्रवचन होना यह कार्य कारक है। (3) करण : केवलज्ञानादि गुण करण कारक है। (4) संप्रदान : आत्म-गुणों का परस्पर सहायरूप दान अथवा लाभ, यह संप्रदान है। (5) अपादान : परभाव का त्याग अपादान कारक है। (6) अनन्त गुणों का आश्रय आत्मा है, यह आधार है। इस प्रकार पूर्ण शुद्ध आत्मदशा में कतादि षट्कारक का परिणमन स्व-स्वरूप में ही होता है। आत्मा समवाय संबंध से अपने में रहे हुए ज्ञानादि स्वकार्य का कर्ता है और इसीलिए सिद्ध परमात्मा सादि-अनन्तकाल तक असंख्यात प्रदेशरूप क्षेत्र में ही रहते हैं।

शुद्धपणे पर्याय प्रवर्तन कार्यमें रे; ते.
कर्तादिक परिणाम ते आतम धर्ममें रे; ते
चेतन चेतन भाव करे समवेतमें रे, क.
सादि अनंतो काल, रहे निज खेतमें रे     ।।र. 4।।
अर्थ 5 : यह जीव जब तक पर (पुद्गल) वस्तुओं को अपनी मानकर उनका भोग करता हैं तब तक ही उसे पर का कर्तृत्व (परकर्तापन) होता है। परंतु इस जीव को जब शुद्ध आत्मस्वरूप प्रकट करने की रूचि जाग्रत होती है, तब वह जीव पर-कर्तृत्व को स्वीकार नहीं करना अर्थात् मोक्षरूपी कार्य को करने की अभिलाषा होने पर, पर का कर्तृत्व उसमें नहीं रहता। शुद्धात्मस्वरूप की प्राप्तिरूप कार्य को करने की रुचि होने से कारकचक्र परिवर्तित हो जाता है और स्व-कार्य के अनुरूप वह अपने मूल स्वभाव को अर्थात् अपने अचल अखण्ड, अविनाशी आत्मस्वभाव को ग्रहण करता है। जिसके फलस्वरूप आत्मा अपने परमात्म-पद को प्राप्त करता है।

पर कर्तृत्व स्वभाव करे तां लगी करे रे, क.
शुद्ध कार्य रुचि भास थये नवि आदरे रे; थ.
शुद्धात्म, निज कार्य रुचे कारक फिरे रे, रु.
तेहिज मूल स्वभाव, ग्रहे निज पद वरे रे     ।।ग्र. 5।।
अर्थ 6 : षट्कारक क्या है? कर्तादि छहों कारकों की अवस्था का विचार करने से ज्ञात होता है कि कारक, कारण और कार्यरूप है। क्योंकि, वे कार्य को सिद्ध करने के साधन हैं और वे वस्तु (आत्मा) के प्रकट निरावरण पर्याय हैं। यह शास्त्रवचन मन में रहा हुआ है, परन्तु जब निराकार या साकार चेतना शुद्ध आत्मस्वरूप के ध्यान में लीन होती है तब कर्तादि छहों कारक परभाव को छोड़कर निज साधकभाव को प्राप्त करती हैं। कर्म का विदारण करना और स्वरूप को प्रकट करना, यही कारक का साधक स्वभाव है।

कारण कारज रुप, अछे कारक दशा रे।। अछे.।।
वस्तु प्रगट पर्याय, एह मनमें वस्या रे ।। एह.।।
पण शुद्ध स्वरुप ध्यान, चेतनता ग्रह रे।। चेतनता.।।
तव निज साधकभाव सकल कारक लहे रे।।     ।।स. 6।।
अर्थ 7 : इस प्रकार श्री अरिहन्त परमात्मा के दर्शन, पूजा और सेवा से छहों कारकों का वाधकभाव मिटकर साधकभाव हो जाने से क्रमशः पूर्णानन्द स्वरूप की प्राप्ति होती है। अतः मेरे पूर्णानन्द अव्याबाध सुख को प्रकट करने में पुष्ट (नियामक) निमित्त-आलंबनरूप श्री अरिहन्त प्रभु की सेवा (आज्ञापालन) ही है। अतः देवों में चन्द्र के समान निर्मल ऐसे जिनेश्वर परमात्मा की परम भक्ति को हृदय में धारण करो और अव्याबाध (परभाव की पीड़ा-रहितः, अनन्त, अक्षय पद को प्राप्त करो। जिन भक्ति ही सारी साधनाओं का सार है।

माहरुं पूर्णानंद, प्रकट करवा भणी रे।। प्रकट.।।
पुष्टालंबन रुप, सेव प्रभुजी तणी रे ।। सेव।।
'देवचंद्र' जिनचंद्र, भक्ति मनमे धरो रे ।। भक्ति.।।
अव्याबाध अनंत, अक्षय पद आदरो रे    ।।अ. 7।।

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shri Arnath shivpur sath kharori,Devchandra chovishi 18 श्री अरनाथ भगवानना स्तवन

|| प्रणमो श्री अरनाथ, शिवपुर साथखरोरी LYRICS - JAIN STAVAN SONG ||
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 shri Arnath shivpur sath kharori,Devchandra chovishi
 स्तवन स्तवन सांग जैन स्तवन

 श्री अरनाथ भगवानना स्तवन Devchandraji jain stavan

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||  श्री अरनाथ भगवानना स्तवन ||  


प्रणमो श्री अरनाथ, शिवपुर साथखरोरी;
त्रिभुवन जन आधार, भवनिस्तार करोरी     ।।1।।
 
प्रणमो श्री अरनाथ, शिवपुर साथखरोरी;
त्रिभुवन जन आधार, भवनिस्तार करोरी     ।।1।।
 
कर्ता कारण योग, कारज सिद्धि लहेरी;
कारण चार अनूप, कार्यार्थी तेह ग्रहेरी    ।।2।।
 
जे कारण ते कार्य, थाये पूर्ण पदेरी;
उपादान ते हेतु, माटी घट ते वदेरी     ।।3।।
 
उपादानथी भिन्न, जे विणु कार्य न थाये;
न हुवे कारज रूप, कर्त्ताने व्यवसाये     ।।4।।

कारण तेह निमित्त, चक्रादिक घट भावे,
कार्य तथा समवाय, कारण नियतने दावे     ।।5।।
 
वस्तु अभेद स्वरूप, कार्यपणुं न ग्रहेरी;
ते असाधारण हेतु कुंभे थास लहेरी     ।।6।।
 
जेहनो न व्यापार, भिन्न नियत बहु भावी;
भूमि काल आकाश, घट कारण सद्भावी     ।।7।।
 
एह अपेक्षा हेतु, आगममांहि कह्योरी;
कारण पद उत्पन्न, कार्य थये न लह्योरी     ।।8।।
 
कर्ता आतम द्रव्य, कार्य सिद्धिपणोरी;
निज सत्तागत धर्म, ते उपादान गणोरी     ।।9।।
 
योग समाधि विधान, असाधारण तेह वदेरी;
विधि आचरणा भक्ति, जिणे निज कार्य सधेरी     ।।10।।
 
नर गति पढम संघयण, तेह अपेक्षा जाणो;
निमित्ताश्रित उपादान, तेहने लेखे आणो    ।।11।।
 
निमित्त हेतु जिनराज, समता अमृत खाणी;
प्रभु अवलंबन सिद्धि, नियमा एह वखाणी    ।।12।।
 
पुष्ट हेतु अरनाथ, तेहने गुणथी हलीयें;
रीझ भक्ति बहुमान, भोग ध्यानथी मलीयें    ।।13।।
 
मोटाने उत्संग बेठाने सी चिंता;
तिम प्रभु चरण पसाय, सेवक थया निचिंता    ।।14।।
 
अर प्रभु प्रभुता रंग, अंतर शक्ति विकासी;
'देवचंद्र' ने आनंद, अक्षय भोग विलासी    ।।15।।


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अर्थ 1-2 : करूणा के भण्डार, जगत् के नाथ श्री कंथुनाथ भगवान् समवसरण में विराजमान होकर बारह प्रकार की पर्षदा के समक्ष वस्तु-स्वरूप जीवाजीवादि तत्त्वों के मूल स्वरूप को प्रकाशित करते हैं। हे प्रभो ! आपके मुख की निर्मलवाणी जो अपने कानों से सुनते हैं, वे धन्य है क्योंकि वे लोग सफल गुणरत्नों की खान बनते हैं-सर्वगुणसम्पन्न बनते हैं।

समवसरण बेसी करी रे, बारह पर्षद मांहे;
वस्तु स्वरूप प्रकाशता रे, करुणाकर जगनाहो रे।।
कुंथु जिनेसरू।।    ।।1।।
निरमल तुज मुख वाणी रे;
जे श्रवणे सुणे, तेहिज गुण मणि खाणी रे     ।।कुंथु 2।।
अर्थ 3 : जिनवाणी से मोक्षमार्ग का संपूर्ण प्रकाश जगत् में फैलता है क्योंकि जिनेश्वर देव सब पदार्थों के, सर्व पर्यायों को केवलज्ञान द्वारा जानकर जीवों के हित के लिए उपदेश देते हैं। उनकी देशना में प्रकाशित मुख्य मुद्दे इस प्रकार हैं – (1) वस्तु में रहे हुए गुणपर्याय एवं स्वभाव की अनंतना के स्वरूप का वर्णन। (2) नय (3) गम (4) भंग (5) निक्षेप के स्वरूप का वर्णन। तथा. (6) नयादि के अगाध स्वरूप का हेय (त्याग करने योग्य), उपादेय (ग्रहण करने योग्य) के विभाग के रूप में प्रतिपादन।

गुण पर्याय अनंतता रे, वली स्वभाव अगाह;
नय गम भंग निक्षेपना रे, हेया देय प्रवाहो रे     ।।कुंथु 3।।
अर्थ 4 : श्री कुंथुनाथ प्रभु की देशना में – (1) मोक्ष के सब साधनों का (मोक्ष के मुख्य साधन जिनदर्शन, पूजन, मुनिवंदन, अनुकम्पा से लेकर शुक्लध्यानपर्यंत की भूमिका तय है।) (2) मोक्ष के सर्व साधकों का (मार्गनुसारी से लेकर क्षीणमोह और अयोगी-केवली तक के मोक्षसाधकों का क्रम इस प्रकार है – मार्गानुसारी सम्यक्त्व को ध्येय में रखकर साधना करता है, सम्यग्दृष्टि देशविरति को, देशविरति सर्वविरति को, सर्वविरति शुक्लध्यानी को, शुक्लध्यानी क्षायिकज्ञानादि को और क्षायिक-गुणी सिद्ध-अवस्था को ध्येय में रखकर साधना करता है।) और, (3) मोक्ष को प्राप्त सिद्ध भगवन्तो के स्वरूप का वर्णन होता है। जिनवचन में गौणता और मुख्यता होती है। प्रभु का केवलज्ञान तो समग्र ज्ञेय को जानने में समर्थ है अतः उसमें गौणता या मुख्यता का विचार नहीं है परंतु वचन क्रमबद्ध होने के कारण प्रस्तुत में उपयोगी विवक्षित-धर्म को मुख्यरूप से और शेष अविवक्षित धर्मों को गौण रूप से कहा जाता है।

कुंथुनाथप्रभु देशना रे, साधन साधक सिद्ध;
गौण मुख्यता वचनमां रे, ज्ञान ते सकल समृद्धो रे     ।।कुंथु 4।।
अर्थ 5 : जीवादि सब पदार्थ अनन्त धर्म (स्वभाव) युक्त होते हैं अतः उन पदार्थो के जीव-आदि ना भी उसमें रहे हुए अनंत धर्मों को बताते हैं। (जीव – इस शब्दोच्चार मात्र से भी उसके अनन्त धर्मों का कथन हो जाता है।) तथापि, केवलज्ञानी भगवंत अवसर देखकर श्रोता के बोध (जानने की योग्यता) के अनुसार अर्पित-वचन कहते हैं अर्थात् प्रयोजनवश विवक्षित वचन कहते हैं। (वस्तु में रहे हुए अनेक धर्मों में से जिस धर्म को कहने का प्रयोजन हो उस समय उस धर्म को विवक्षितकर ग्रहण करना या कहना – यह अर्पित कहा जाता है। प्रयोजन के अभाव में जिसकी विवक्षा नहीं है – वह अनर्पित कहा जाता है।)

वस्तु अनंत स्वभाव छे रे, अनंत कथक तसु नाम;
ग्राहक अवसर बोधथी रे, कहवे अर्पित कामो रे     ।।कुंथु 5।।
अर्थ 6 : छद्मस्थ जीवों को शेष अनर्पित धर्मों (विवक्षित धर्म से शेष रहे धर्मों) की सापेक्षरूप से श्रद्धा रखनी चाहिए और सापेक्षरूप से ज्ञान करना चाहिए। जब केवल ज्ञान प्रकट होता है तब अर्पित और अनर्पित-उभय रहित बोध होता है क्योंकि केवलज्ञान सब धर्मों को समकाल में जान लेता हैं।

शेष अनर्पित धर्मने रे, सापेक्ष श्रद्धा बोध;
उभय रहित भासन होवे रे, प्रगटे केवल बोधो रे     ।।कुंथु 6।।
अर्थ 7 : परमात्मा प्रभु की प्रभुता का तात्त्विक स्वरूप जैसे जैसे जिनवाणी द्वारा सुनने-समझने को मिलता है वैसे वैसे भव्य जीवों के हृदय अपूर्व आनंद, आश्चर्य और हर्ष से नाच उठते हैं। हे प्रभो ! आप में एक ही समय में अनन्त गुण पर्याय की छति (सत्ता) परिणति और वर्तना तथा उसके ज्ञान, भोग और आनन्द रहे हुए हैं। इसी तरह रम्य शुद्ध स्वरूप में रमण करनेवाले आप अनन्त गुण के समूह हैं।

छति परिणति गुण वर्तना रे, भासन भोग आनंद;
सम काले प्रभु ताहरे रे, रम्य रमण गुणवृंदो रे     ।।कुंथु 7।।
अर्थ 8 : स्व-स्वभाव (स्व-पर्याय की परिणति) की अपेक्षा से आत्मादि द्रव्य में स्यात् अस्तिता रही हुई है और पर-स्वभाव की अपेक्षा से स्यात् नास्तिता रही हुई है, वह पर-नास्तिता भी सत्रूप है। इसी तरह स्यात् अवक्तव्य (सीय उभय) स्वभाव भी रहा हुआ है। उपलक्षण से शेष भंग भी समझ लेने चाहिए।

निज भावे सिय अस्तिता रे, पर नास्तित्व स्वभाव;
अस्तिपणे ते नास्तिता रे, सीय ते उभय स्वभावो रे     ।।कुंथु 8।।
अर्थ 9 : मेरा जो सच्चिादानन्द अस्ति-स्वभाव है, वह अभी सत्तागत है, उसे प्रकट करने के लिए मैं वैराग्यसहित तीव्र रुचि (इच्छा) रखता हूँ और प्रभु के समक्ष बन्दन-नमन करके याचना करता हूँ कि, हे प्रभो ! आत्मा के लिए हितकारी ऐसा मेरा अस्ति-स्वभाव प्रकट करो।

अस्ति स्वभाव जे आपणो रे, रूचि वैराग्य समेत;
प्रभु सन्मुख वंदन करी रे, मागीश आतम हेतो रे      ।।कुंथु 9।।
अर्थ 10 : आत्मसत्तागत अनन्त ज्ञानादि स्वभाव की रुचि-अभिलाषा जागृत होने से उसी अस्ति-स्वभाव की अनन्तता का ध्यान करता हुआ साधक परमानन्द स्वरूप देवों में चन्द्र समान उज्वल परमात्म-पद को प्राप्त करता है।

अस्ति स्वभाव रुचि थयी रे, ध्यातो अस्ति स्वभाव;
देवचंद्र पद ते लहे रे, परमानंद जमावो रे     ।।कुंथु 10।।

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JAINAM JAYATI SHASHNAM

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17 Kunthunath Jinesaru Samvosaran besi Kunthu jineshwar Devchandra chovishi

|| कुंथु जिनेसरू Samvosaran besi Kunthu LYRICS - JAIN STAVAN SONG ||
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 Kunthunath Jinesaru Samvosaran besi स्तवन स्तवन सांग

जैन स्तवन


श्री कुंथुनाथ भगवान् स्तवन Devchandraji jain stavan

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 Kunthunath Jinesaru Samvosaran besi
कुंथु जिनेसरू



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||  कुंथु जिनेसरू ||  


समवसरण बेसी करी रे, बारह पर्षद मांहे;
वस्तु स्वरूप प्रकाशता रे, करुणाकर जगनाहो रे।।
कुंथु जिनेसरू।।    ।।1।।

निरमल तुज मुख वाणी रे;
जे श्रवणे सुणे, तेहिज गुण मणि खाणी रे     ।।कुंथु 2।।
 
गुण पर्याय अनंतता रे, वली स्वभाव अगाह;
नय गम भंग निक्षेपना रे, हेया देय प्रवाहो रे     ।।कुंथु 3।।
 
कुंथुनाथप्रभु देशना रे, साधन साधक सिद्ध;
गौण मुख्यता वचनमां रे, ज्ञान ते सकल समृद्धो रे     ।।कुंथु 4।।
 
वस्तु अनंत स्वभाव छे रे, अनंत कथक तसु नाम;
ग्राहक अवसर बोधथी रे, कहवे अर्पित कामो रे     ।।कुंथु 5।।
 
शेष अनर्पित धर्मने रे, सापेक्ष श्रद्धा बोध;
उभय रहित भासन होवे रे, प्रगटे केवल बोधो रे     ।।कुंथु 6।।
 
छति परिणति गुण वर्तना रे, भासन भोग आनंद;
सम काले प्रभु ताहरे रे, रम्य रमण गुणवृंदो रे     ।।कुंथु 7।।
 
निज भावे सिय अस्तिता रे, पर नास्तित्व स्वभाव;
अस्तिपणे ते नास्तिता रे, सीय ते उभय स्वभावो रे     ।।कुंथु 8।।
 
अस्ति स्वभाव जे आपणो रे, रूचि वैराग्य समेत;
प्रभु सन्मुख वंदन करी रे, मागीश आतम हेतो रे      ।।कुंथु 9।।
 
अस्ति स्वभाव रुचि थयी रे, ध्यातो अस्ति स्वभाव;
देवचंद्र पद ते लहे रे, परमानंद जमावो रे     ।।कुंथु 10।।


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अर्थ 1-2 : करूणा के भण्डार, जगत् के नाथ श्री कंथुनाथ भगवान् समवसरण में विराजमान होकर बारह प्रकार की पर्षदा के समक्ष वस्तु-स्वरूप जीवाजीवादि तत्त्वों के मूल स्वरूप को प्रकाशित करते हैं। हे प्रभो ! आपके मुख की निर्मलवाणी जो अपने कानों से सुनते हैं, वे धन्य है क्योंकि वे लोग सफल गुणरत्नों की खान बनते हैं-सर्वगुणसम्पन्न बनते हैं।

समवसरण बेसी करी रे, बारह पर्षद मांहे;
वस्तु स्वरूप प्रकाशता रे, करुणाकर जगनाहो रे।।
कुंथु जिनेसरू।।    ।।1।।
निरमल तुज मुख वाणी रे;
जे श्रवणे सुणे, तेहिज गुण मणि खाणी रे     ।।कुंथु 2।।
अर्थ 3 : जिनवाणी से मोक्षमार्ग का संपूर्ण प्रकाश जगत् में फैलता है क्योंकि जिनेश्वर देव सब पदार्थों के, सर्व पर्यायों को केवलज्ञान द्वारा जानकर जीवों के हित के लिए उपदेश देते हैं। उनकी देशना में प्रकाशित मुख्य मुद्दे इस प्रकार हैं – (1) वस्तु में रहे हुए गुणपर्याय एवं स्वभाव की अनंतना के स्वरूप का वर्णन। (2) नय (3) गम (4) भंग (5) निक्षेप के स्वरूप का वर्णन। तथा. (6) नयादि के अगाध स्वरूप का हेय (त्याग करने योग्य), उपादेय (ग्रहण करने योग्य) के विभाग के रूप में प्रतिपादन।

गुण पर्याय अनंतता रे, वली स्वभाव अगाह;
नय गम भंग निक्षेपना रे, हेया देय प्रवाहो रे     ।।कुंथु 3।।
अर्थ 4 : श्री कुंथुनाथ प्रभु की देशना में – (1) मोक्ष के सब साधनों का (मोक्ष के मुख्य साधन जिनदर्शन, पूजन, मुनिवंदन, अनुकम्पा से लेकर शुक्लध्यानपर्यंत की भूमिका तय है।) (2) मोक्ष के सर्व साधकों का (मार्गनुसारी से लेकर क्षीणमोह और अयोगी-केवली तक के मोक्षसाधकों का क्रम इस प्रकार है – मार्गानुसारी सम्यक्त्व को ध्येय में रखकर साधना करता है, सम्यग्दृष्टि देशविरति को, देशविरति सर्वविरति को, सर्वविरति शुक्लध्यानी को, शुक्लध्यानी क्षायिकज्ञानादि को और क्षायिक-गुणी सिद्ध-अवस्था को ध्येय में रखकर साधना करता है।) और, (3) मोक्ष को प्राप्त सिद्ध भगवन्तो के स्वरूप का वर्णन होता है। जिनवचन में गौणता और मुख्यता होती है। प्रभु का केवलज्ञान तो समग्र ज्ञेय को जानने में समर्थ है अतः उसमें गौणता या मुख्यता का विचार नहीं है परंतु वचन क्रमबद्ध होने के कारण प्रस्तुत में उपयोगी विवक्षित-धर्म को मुख्यरूप से और शेष अविवक्षित धर्मों को गौण रूप से कहा जाता है।

कुंथुनाथप्रभु देशना रे, साधन साधक सिद्ध;
गौण मुख्यता वचनमां रे, ज्ञान ते सकल समृद्धो रे     ।।कुंथु 4।।
अर्थ 5 : जीवादि सब पदार्थ अनन्त धर्म (स्वभाव) युक्त होते हैं अतः उन पदार्थो के जीव-आदि ना भी उसमें रहे हुए अनंत धर्मों को बताते हैं। (जीव – इस शब्दोच्चार मात्र से भी उसके अनन्त धर्मों का कथन हो जाता है।) तथापि, केवलज्ञानी भगवंत अवसर देखकर श्रोता के बोध (जानने की योग्यता) के अनुसार अर्पित-वचन कहते हैं अर्थात् प्रयोजनवश विवक्षित वचन कहते हैं। (वस्तु में रहे हुए अनेक धर्मों में से जिस धर्म को कहने का प्रयोजन हो उस समय उस धर्म को विवक्षितकर ग्रहण करना या कहना – यह अर्पित कहा जाता है। प्रयोजन के अभाव में जिसकी विवक्षा नहीं है – वह अनर्पित कहा जाता है।)

वस्तु अनंत स्वभाव छे रे, अनंत कथक तसु नाम;
ग्राहक अवसर बोधथी रे, कहवे अर्पित कामो रे     ।।कुंथु 5।।
अर्थ 6 : छद्मस्थ जीवों को शेष अनर्पित धर्मों (विवक्षित धर्म से शेष रहे धर्मों) की सापेक्षरूप से श्रद्धा रखनी चाहिए और सापेक्षरूप से ज्ञान करना चाहिए। जब केवल ज्ञान प्रकट होता है तब अर्पित और अनर्पित-उभय रहित बोध होता है क्योंकि केवलज्ञान सब धर्मों को समकाल में जान लेता हैं।

शेष अनर्पित धर्मने रे, सापेक्ष श्रद्धा बोध;
उभय रहित भासन होवे रे, प्रगटे केवल बोधो रे     ।।कुंथु 6।।
अर्थ 7 : परमात्मा प्रभु की प्रभुता का तात्त्विक स्वरूप जैसे जैसे जिनवाणी द्वारा सुनने-समझने को मिलता है वैसे वैसे भव्य जीवों के हृदय अपूर्व आनंद, आश्चर्य और हर्ष से नाच उठते हैं। हे प्रभो ! आप में एक ही समय में अनन्त गुण पर्याय की छति (सत्ता) परिणति और वर्तना तथा उसके ज्ञान, भोग और आनन्द रहे हुए हैं। इसी तरह रम्य शुद्ध स्वरूप में रमण करनेवाले आप अनन्त गुण के समूह हैं।

छति परिणति गुण वर्तना रे, भासन भोग आनंद;
सम काले प्रभु ताहरे रे, रम्य रमण गुणवृंदो रे     ।।कुंथु 7।।
अर्थ 8 : स्व-स्वभाव (स्व-पर्याय की परिणति) की अपेक्षा से आत्मादि द्रव्य में स्यात् अस्तिता रही हुई है और पर-स्वभाव की अपेक्षा से स्यात् नास्तिता रही हुई है, वह पर-नास्तिता भी सत्रूप है। इसी तरह स्यात् अवक्तव्य (सीय उभय) स्वभाव भी रहा हुआ है। उपलक्षण से शेष भंग भी समझ लेने चाहिए।

निज भावे सिय अस्तिता रे, पर नास्तित्व स्वभाव;
अस्तिपणे ते नास्तिता रे, सीय ते उभय स्वभावो रे     ।।कुंथु 8।।
अर्थ 9 : मेरा जो सच्चिादानन्द अस्ति-स्वभाव है, वह अभी सत्तागत है, उसे प्रकट करने के लिए मैं वैराग्यसहित तीव्र रुचि (इच्छा) रखता हूँ और प्रभु के समक्ष बन्दन-नमन करके याचना करता हूँ कि, हे प्रभो ! आत्मा के लिए हितकारी ऐसा मेरा अस्ति-स्वभाव प्रकट करो।

अस्ति स्वभाव जे आपणो रे, रूचि वैराग्य समेत;
प्रभु सन्मुख वंदन करी रे, मागीश आतम हेतो रे      ।।कुंथु 9।।
अर्थ 10 : आत्मसत्तागत अनन्त ज्ञानादि स्वभाव की रुचि-अभिलाषा जागृत होने से उसी अस्ति-स्वभाव की अनन्तता का ध्यान करता हुआ साधक परमानन्द स्वरूप देवों में चन्द्र समान उज्वल परमात्म-पद को प्राप्त करता है।

अस्ति स्वभाव रुचि थयी रे, ध्यातो अस्ति स्वभाव;
देवचंद्र पद ते लहे रे, परमानंद जमावो रे     ।।कुंथु 10।।

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