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ॐ श्री बडी शान्ति स्तोत्र ॐ
बृहत् शान्ति स्तोत्र · स्नात्र-प्रतिष्ठा-यात्रा के अवसर पर पठनीय शान्ति-पाठ
श्री बडी शान्ति स्तोत्र (बृहत् शान्ति) जैन परम्परा का अत्यन्त पूजनीय शान्ति-पाठ है, जिसकी रचना श्री मानदेव सूरि से सम्बद्ध मानी जाती है। यह स्तोत्र प्रायः स्नात्र-पूजा, प्रतिष्ठा, यात्रा-महोत्सव तथा प्रतिक्रमण के अन्त में शान्ति-कलश के साथ पढ़ा जाता है। इसमें चौबीसों तीर्थंकरों, मुनिवरों, षोडश विद्या-देवियों, नवग्रहों तथा समस्त शासन-देवताओं का आवाहन करके श्री संघ, जनपद, राष्ट्र एवं समस्त प्राणियों के लिए शान्ति, तुष्टि, पुष्टि तथा मंगल की प्रार्थना की जाती है। इसका समापन "जैन जयति शासनम्" के उद्घोष से होता है।
श्री संघ शान्तिसर्व मंगलरोग-उपसर्ग शमनराष्ट्र-कल्याणशुभ प्रतिष्ठा-यात्रा
भो भो भव्याः ! शृणुत वचनं प्रस्तुतं सर्वमेतद् ये यात्रायां त्रिभुवन गुरोराऽर्हता ! भक्ति भाजः ! तेषां शान्तिर् भवतु-भवता-मर्हदादि-प्रभावा-दारोग्य-श्री-धृति-मति-करी-क्लेश-विध्वंस हेतुः।१।
भो भो भव्य लोका ! इह-हि-भरतै रावत-विदेह-संभवानां समस्त तीर्थकृतां जन्म न्यासऽऽसन-प्रकम्पा-नन्तरमवधिना विज्ञाय, सौधर्मांधिपतिः सुघोषा-घण्टा-चालना-नन्तरं सकल-सुरा-सुरेन्द्रैः सह समागत्य सविनय-मर्हद्-भट्टारकं गृहीत्वा, गत्वा कनकाद्रि-शृंगे विहित-जन्माभिषेकः शान्ति-मुद्घोषयति यथा-ततोऽहम् कृतानु-कार-मिति कृत्वा, महाजनो येन गतः स पन्था, इति भव्य-जनैः सह समेत्य स्नात्र-पीठे स्नात्रं विधाय शान्ति-मुद् घोषयामि तत् पूजा यात्रा-स्नात्रादि-महोत्सवा-नन्तर-मिति कृत्वा कर्णं दत्वा निशम्यतां निशम्यतां स्वाहा।
ॐ पुण्याहं पुण्याहं, प्रीयन्तां प्रीयन्तां, भगवन्तोऽर्हन्तः सर्वज्ञाः सर्वदशिनस्-त्रिलोक नाथा-स्त्रिलोक महिता स्त्रिलोक पूज्या-स्त्रिलोकेश्वरा-स्त्रिलोकोद्योतकराः।
चतुर्विंशति तीर्थंकर आवाहन
ॐ ऋषभ-अजित-संभव-अभिनंदन-सुमति-पद्मप्रभ-सुपार्श्व-चन्द्रप्रभ-सुविधि-शीतल श्रेयांस-वासुपूज्य-विमल-अनन्त-धर्म-शान्ति-कुन्थु-अर-मल्लि-मुनिसुव्रत-नमि-नेमि-पार्श्व-वर्धमानान्ता जिनाःशान्ताः शान्तिकरा भवन्तु स्वाहा।
ॐ मुनयो मुनि प्रवरा रिपु-विजय दुर्भिक्ष-कान्तारेषु दुर्ग-मार्गेषु रक्षन्तु वो नित्यं स्वाहा।
ॐ ह्रीँ श्रीँ धृति-मति-कीर्ति कान्ति-बुद्धि-लक्ष्मी-मेधा-विद्या-साधन-प्रवेश-निवेशनेषु सुगृहीत-नामानो जयन्तु ते जिनेन्द्राः।
षोडश विद्या-देवी आवाहन
ॐ रोहिणी-प्रज्ञप्ति-वज्रशृंखला-वज्रांकुशी अप्रतिचक्रा-पुरुष-दत्ता-काली-महाकाली-गौरी-गान्धारी-सर्वास्त्रा-महा-ज्वाला-मानवी-वैरोट्या-अच्छुप्ता-मानसी-महामानसी-षोडश-विद्या-देव्यो रक्षन्तु वो नित्यं स्वाहा।
ॐ आचार्यो-पाध्याय-प्रभृति-चातुर वर्णस्य श्री श्रमण-संघस्य शान्तिर्-भवतु-तुष्टिर्-भवतु पुष्टिर्-भवतु।
नवग्रह एवं दिक्पाल
ॐ ग्रहाश्चन्द्र-सूर्यांगारक-बुध-बृहस्पति-शुक्र-शनैश्चर-राहु-केतु-सहिताः स-लोगपालाः सोम-यम-वरुण-कुबेर-वास-वादित्य-स्कन्द-विनायकोपेता ये चान्येऽपि ग्राम-नगर-क्षेत्र-देवता-दयस्ते सर्वे प्रियन्तां अ-क्षीण-कोश-कोष्ठागारा नर-पतयश्च भवन्तु स्वाहा।
ॐ पुत्र-मित्र-भ्रातृ-कलत्र-सुहृत्-स्वजन-संबन्धि-बन्धु-वर्ग-सहिता नित्यं चामोद-प्रमोद-कारिण, अस्मिँश्च भूमण्डलाय तन निवासि साधु-साध्वी-श्रावक-श्राविकाणां रोगोपसर्ग-व्याधि-दुःख दुर्भिक्ष-दौर्मनस्योपशमनाय शान्तिभवतु।
ॐ तुष्टि-पुष्टि-ऋद्धि-वृद्धि-मांगल्योत्सवाः, सदा पादुर्-भूतानि पापानि शाम्यन्तु दुरितानि, शत्रवः पराङ्मुखा भवन्तु स्वाहा।
श्रीमते शान्ति-नाथाय, नमः शान्तिं विधायिने।
त्रैलोक्यस्यामराधीश-मुकुटाभ्यर्चितांघ्रये॥१॥
शान्तिः शान्तिकरः श्रीमान्, शान्तिं दिशतु मे गुरुः।
शान्तिरेव सदा तेषां, येषां शान्ति गृहे गृहे॥२॥
उन्मृष्ट-रिष्ट-दुष्ट-ग्रह-गति-दुःस्वप्न-दुर्निमित्तादि।
संपादित-हित-संपन्नाम-ग्रहणं जयति शान्तेः॥३॥
श्री-संघ-जगज्-जन-पद-राजाधिप राज-सन्निवेशानाम्।
गोष्ठिक पुर मुख्यानां व्याहरणैर् व्याहरेच्छान्तिम्॥४॥
शान्तिर्भवतु उद्घोष
श्री - श्रमण - संघस्य शान्तिर्भवतु...
श्री - जनपदानां शान्तिर्भवतु...
श्री - राजाधिपानां शान्तिर्भवतु...
श्री - राजसन्निवेशानां शान्तिर्भवतु...
श्री - गोष्ठिकानां शान्तिर्भवतु...
श्री - पौरमुख्यानां शान्तिर्भवतु...
श्री - पौरजनस्य शान्तिर्भवतु...
श्री - ब्रह्मलोकस्य शान्तिर्भवतु...
ॐ स्वाहा ॐ स्वाहा ॐ श्री पार्श्वनाथाय स्वाहा।
एषा शान्तिः प्रतिष्ठा-यात्रास्नात्रा द्यवसानेषु शान्ति कलशं गृहीत्वा कुंकम-चन्दन-कर्पूरा-ऽगरु-धूपवास-कुसुमांजलि-समेतःस्नात्र-चतुष्किकायां श्री संघ-समेतःशुचि शुचि-वपुः, पुष्प-वस्त्र-चन्दनाभरण-लंकृतः पुष्पमालां कण्ठे कृत्वा, शान्ति-मुद्घोषयित्वा, शान्ति पानीयं मस्तके दातव्यमिति।
नृत्यन्ति नृत्यं मणि-पुष्प-वर्षं,
सृजन्ति गायन्ति च मंगलानि।
स्तोत्राणि गोत्राणि पठन्ति मन्त्रान्,
कल्याणभाजो हि जिनाभिषेके॥१॥
शिवमस्तु सर्वजगतः, परहितनिरता भवन्तु भूतगणाः।
दोषाः प्रयान्तु नाशं, सर्वत्र सुखी भवतुः लोकः॥२॥
अहं तित्थयर-माया, सिवा-देवी तुम्ह नयर-निवासिनी।
अम्ह सिवं तुम्ह सिवं, असिवो-वसमं सिवं भवतु स्वाहा॥३॥
उपसर्गाः क्षयं यान्ति, छिद्यन्ते विघ्न - वल्लयः।
मनः प्रसन्नता-मेति, पूज्यमाने जिनेश्वरे॥४॥
सर्व मंगल मांगल्यं, सर्व कल्याण- कारणम्।
प्रधानं सर्व-धर्माणां, जैन जयति शासनम्॥५॥
|| जैन जयति शासनम् ||
पाठ-विधि: स्नात्र-पूजा, प्रतिष्ठा, यात्रा-महोत्सव अथवा प्रतिक्रमण के अन्त में शान्ति-कलश ग्रहण कर, श्री संघ सहित शुद्ध चित्त से इस बृहत् शान्ति-पाठ का उच्चारण करें; तत्पश्चात् शान्ति-जल मस्तक पर धारण करें।
अर्थ एवं भावार्थ
मंगल-संबोधन (भो भो भव्याः): हे भव्य जीवो! यह वचन सुनो। जो त्रिभुवन-गुरु अरिहंत की यात्रा में भक्ति-भाव रखते हैं, उन्हें अर्हत् आदि के प्रभाव से आरोग्य, श्री, धृति एवं मति देने वाली तथा क्लेश का विध्वंस करने वाली शान्ति प्राप्त हो।
इन्द्र-कृत जन्माभिषेक (कथा-भाग): जब भरत, ऐरावत एवं विदेह क्षेत्रों में तीर्थंकर का जन्म होता है, तब सौधर्मेन्द्र का आसन कम्पित होता है; अवधिज्ञान से जानकर, सुघोषा घण्टा बजने पर समस्त देव-इन्द्रों सहित इन्द्र मेरु पर्वत (कनकाद्रि) के शिखर पर जन्माभिषेक करते हैं एवं “शान्ति” की उद्घोषणा करते हैं। “जिस मार्ग पर महाजन चले, वही मार्ग है” — इसी भाव से भव्य-जनों सहित स्नात्र-पीठ पर स्नात्र कर शान्ति की घोषणा की जाती है। यही भाग प्रतिष्ठा एवं स्नात्र-महोत्सव का आधार-वचन है।
पुण्याह-वाचन: मंगल दिवस हो! अर्हन्त भगवान — सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, त्रिलोकनाथ, त्रिलोक-पूज्य एवं त्रिलोक के प्रकाशक — प्रसन्न हों।
चौबीस तीर्थंकर आवाहन: श्री ऋषभ से लेकर श्री वर्धमान (महावीर स्वामी) पर्यन्त चौबीसों शान्त जिन शान्तिकर हों।
मुनि एवं जिनेन्द्र-रक्षा: शत्रु-विजय, दुर्भिक्ष, बीहड़ वन एवं कठिन मार्गों में मुनिवर सदा रक्षा करें; धृति, मति, कीर्ति, बुद्धि, लक्ष्मी एवं विद्या की प्राप्ति में सुविख्यात जिनेन्द्र जयवन्त हों।
षोडश विद्या-देवी आवाहन: रोहिणी, प्रज्ञप्ति, वज्रशृंखला आदि सोलह विद्या-देवियाँ सदा रक्षा करें।
श्रमण-संघ की शान्ति: आचार्य, उपाध्याय आदि चतुर्विध श्री श्रमण-संघ को शान्ति, तुष्टि एवं पुष्टि प्राप्त हो।
नवग्रह एवं लोकपाल: चन्द्र, सूर्य, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु एवं केतु — ये नवग्रह तथा सोम-यम-वरुण-कुबेर आदि लोकपाल एवं समस्त ग्राम-नगर-देवता प्रसन्न हों; राजाओं के कोश एवं भण्डार अक्षय रहें।
परिवार एवं संघ की शान्ति: पुत्र, मित्र, बन्धु आदि सहित इस भूमण्डल के निवासी साधु-साध्वी-श्रावक-श्राविका के रोग, उपसर्ग, व्याधि, दुःख, दुर्भिक्ष एवं दौर्मनस्य के शमन हेतु शान्ति हो; पाप एवं दुरित शान्त हों, शत्रु पराङ्मुख हों।
शान्तिनाथ-वन्दना (चार श्लोक): शान्ति के विधायक श्री शान्तिनाथ को नमस्कार; वे गुरु मुझे शान्ति दें; जिनके घर-घर में शान्ति है उन्हें सदा शान्ति प्राप्त हो; दुष्ट-ग्रह, दुःस्वप्न एवं अपशकुन का नाश करने वाला यह शान्ति-पाठ जयवन्त है; श्री संघ, जनपद, राजा एवं नगर — सबके लिए शान्ति की उद्घोषणा की जाती है।
शान्तिर्भवतु उद्घोष: श्री श्रमण-संघ, जनपद, राजा, नगर-मुख्य, पौरजन एवं ब्रह्मलोक तक — सबके लिए “शान्ति हो” की उद्घोषणा; अन्त में “ॐ श्री पार्श्वनाथाय स्वाहा”।
शान्ति-कलश विधि: प्रतिष्ठा, यात्रा एवं स्नात्र के अन्त में कुंकुम-चन्दन-कर्पूर-अगरु-धूप एवं पुष्पांजलि सहित शान्ति-कलश ग्रहण कर, श्री संघ सहित शुद्ध शरीर से, पुष्प-वस्त्र-चन्दन से अलंकृत होकर, कण्ठ में पुष्पमाला धारण कर, शान्ति की उद्घोषणा करके शान्ति-जल मस्तक पर धारण किया जाता है।
समापन (पाँच श्लोक): जिनाभिषेक के समय देव मणि-पुष्प वर्षाते एवं मंगल-गान करते हैं। “शिवमस्तु सर्वजगतः” — समस्त जगत का कल्याण हो, सब जीव परहित में रत हों, दोषों का नाश हो, सर्वत्र लोक सुखी हो। श्री शिवा-देवी (तीर्थंकर-माता) की मंगल-कामना। “उपसर्गाः क्षयं यान्ति” — जिनेश्वर की पूजा से उपसर्ग नष्ट होते एवं विघ्न कट जाते हैं। और अन्तिम “सर्व मंगल मांगल्यं ... जैन जयति शासनम्” — समस्त मंगलों में मंगल-रूप, सर्व-कल्याण-कारक जैन शासन की जय हो।
Meaning in English
The Badī Śānti (Bṛhat Śānti) opens by addressing the assembly of noble souls, praying that devotees of the Arhat receive a peace that brings health, prosperity, fortitude and intellect and destroys affliction. It then recalls the sacred charter of the rite: when a Tīrthaṅkara is born, Indra's throne trembles, the Sughoṣā bell sounds, the gods assemble, and Indra performs the birth-anointing (janma-abhiṣeka) on Mount Meru and proclaims “Śānti” — a precedent the saṅgha re-enacts at every snātra and pratiṣṭhā. A benediction (puṇyāham) salutes the omniscient Arhats, after which the twenty-four Tīrthaṅkaras from Ṛiṣabha to Mahāvīra are named as bestowers of peace. Blessings are invoked from the great munis, from the sixteen vidyā-devīs (Rohiṇī, Prajñapti, Vajraśṛṅkhalā and the rest), from the fourfold Śramaṇa-saṅgha, and from the nine planets and lokapālas, praying for undiminished prosperity. Peace is sought for the sādhus, sādhvīs, śrāvakas and śrāvikās and their families — for the calming of disease, calamity, famine and despondency. Four verses salute Śāntinātha, “the maker of peace,” and a refrain proclaims śāntir bhavatu — may there be peace — over the saṅgha, the people, the rulers, the towns and beyond. A ritual instruction then describes taking up the śānti-kalaśa and pouring the śānti-water upon the head. The stotra closes with five celebrated verses, among them Śivamastu sarvajagataḥ (may the whole world be blessed), Upasargāḥ kṣayaṃ yānti (calamities perish when the Jineśvara is worshipped), and the famous Sarva-maṅgala-māṅgalyam ... Jaina jayati śāsanam — “victory to the teaching of the Jina.”
मुख्य शब्दार्थ · Key Terms
भो भो भव्याः — “हे भव्य जीवो!” — संबोधन (O worthy souls)।
पुण्याहं — “मंगल/पुण्य दिवस हो” — आशीर्वचन (an auspicious day)।
प्रीयन्तां — “प्रसन्न हों” (May they be pleased)।
शान्तिर्भवतु — “शान्ति हो” (May there be peace)।
षोडश विद्या-देवी — जैन परम्परा की सोलह विद्या-देवियाँ (रोहिणी, प्रज्ञप्ति आदि)।
स्वाहा — आहुति एवं समर्पण-सूचक मंत्र-पद।
जैन जयति शासनम् — “जैन शासन (धर्म) की जय हो” (Victory to the Jina's teaching)
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| श्री बडी शान्ति स्तोत्र | Badi Shanti Stotra (बृहत् शान्ति) |