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Saturday, March 1, 2025

Jain 24 tirthankar Song - AI created by Vikas

Jain 24 Tirthankar Song

Jain 24 Tirthankar Song

A poetic tribute to the divine guides of Jainism

The 24 Tirthankars of Jainism are the supreme spiritual teachers who have attained perfect knowledge and liberation. This song pays homage to their teachings and their enduring spiritual legacy.

Listen to 24 Tirthankars Jain Song

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In the land where dharma took its flight,
Rise the Tirthankars, spreading their light.
Twenty-four guides, so divine,
Teaching us virtues, eternal, benign.

1. Rishabhanatha

🐂
First Tirthankar, symbol: Bull
Rishabhanatha, the primal sage,
Opened the world, set the stage.

2. Ajitanatha

🐘
Second Tirthankar, symbol: Elephant
Ajitanatha, the unconquered one,
Showed the path where deeds are done.

3. Sambhavanatha

🐎
Third Tirthankar, symbol: Horse
Sambhavanatha, with serene grace,
Led his followers to embrace.

4. Abhinandananatha

🐒
Fourth Tirthankar, symbol: Monkey
Abhinandananatha, a joy-filled name,
Life through virtues he proclaimed.

5. Sumatinatha

🦢
Fifth Tirthankar, symbol: Goose/Swan
Sumatinatha, wisdom's key,
Unlocks the truth, sets us free.

6. Padmaprabha

🪷
Sixth Tirthankar, symbol: Red Lotus
Padmaprabha, the lotus' glow,
A symbol of purity, we all know.

7. Suparshvanatha

🐍
Seventh Tirthankar, symbol: Swastika
Suparshvanatha, protector of all,
Guided through karma's cosmic call.

8. Chandraprabha

🌙
Eighth Tirthankar, symbol: Moon
Chandraprabha, the moonlight's balm,
Cooled the soul, instilled calm.

9. Pushpadanta

🐊
Ninth Tirthankar, symbol: Crocodile
Pushpadanta, of floral sheen,
Made devotion evergreen.

10. Shitalanatha

🌳
Tenth Tirthankar, symbol: Shrivatsa
Shitalanatha, cool and kind,
Peace in his teachings, we find.

11. Shreyansanatha

🦏
Eleventh Tirthankar, symbol: Rhinoceros
Shreyansanatha, wealth of truth,
Guided the elders and the youth.

12. Vasupujya

🐃
Twelfth Tirthankar, symbol: Buffalo
Vasupujya, the venerable lord,
Victory in detachment was his reward.

13. Vimalanatha

🐗
Thirteenth Tirthankar, symbol: Boar
Vimalanatha, pure and bright,
Showed the way to inner light.

14. Anantanatha

🦅
Fourteenth Tirthankar, symbol: Falcon
Anantanatha, infinite bliss,
Led by paths we dare not miss.

15. Dharmanatha

Fifteenth Tirthankar, symbol: Vajra/Thunderbolt
Dharmanatha, of righteous fame,
Inspired us to honor his name.

16. Shantinatha

🦌
Sixteenth Tirthankar, symbol: Deer
Shantinatha, peaceful and still,
Broke the chains of worldly will.

17. Kunthunatha

🐐
Seventeenth Tirthankar, symbol: Goat
Kunthunatha, the steady guide,
In his wisdom, we confide.

18. Aranatha

🐠
Eighteenth Tirthankar, symbol: Fish
Aranatha, protector of lands,
Unity and balance in his hands.

19. Mallinatha

🏺
Nineteenth Tirthankar, symbol: Kalasha/Water Pot
Mallinatha, in virtues adorned,
Truths of the spirit, she has borne.

20. Munisuvrata

🐢
Twentieth Tirthankar, symbol: Tortoise
Munisuvrata, ascetic king,
Wisdom and penance, his offering.

21. Naminatha

🔵
Twenty-first Tirthankar, symbol: Blue Lotus
Naminatha, the humble star,
Guiding souls from afar.

22. Neminatha

🐚
Twenty-second Tirthankar, symbol: Conch
Neminatha, with compassion pure,
Taught renunciation, a path so sure.

23. Parshvanatha

🐍
Twenty-third Tirthankar, symbol: Snake Hood
Parshvanatha, a beacon bright,
Fourfold vows, his guiding light.

24. Mahavira

🦁
Twenty-fourth Tirthankar, symbol: Lion
Mahavira, the last, supreme,
Conqueror of self, he redeemed the dream.
Oh Tirthankars, sages of lore,
Your truths will guide forevermore.
In every heart, let your virtues shine,
Eternal is your message, divine!

🕉️ Namo Arihantanam 🙏

A tribute to the 24 Tirthankars of Jainism. May their wisdom guide us all.

Sunday, August 27, 2023

तार हो तार प्रभु मुज सेवक Tar ho tar sevak jain song mahavir swami devchandraji

|| Tar ho tar prabhu mujh sevak Mahavir swami - JAIN STAVAN SONG ||
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 तार हो तार प्रभु मुज सेवक स्तवन सांग

जैन स्तवन


श्री वीर भगवान् स्तवन Devchandraji jain stavan

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||  तार हो तार प्रभु मुज सेवक ||  


तार हो तार प्रभु मुज सेवक भणी, जगतमां एटलुं सुजश लीजे;
दास अवगुण भर्यो जाणी पोता तणो, दयानिधि दीन पर दया कीजे    ।।1।।

राग द्वेषे भर्यो मोह वैरी नड्यो, लोकनी रीतमां घणुंए रातो;
क्रोध वश धमधम्यो शुद्ध गुण नवि रम्यो, भम्यो भव मांहे हुं विषय मातो    ।।2।। 

आदर्युं आचरण लोक उपचारथी, शास्त्र अभ्यास पण कांई कीधो;
शुद्ध श्रद्धा न वली आत्म अवलंब विण, तेहवो कार्य तिणे कोन सीधो    ।।3।। 

स्वामी दरिसण समो निमित्त लही निरमलो, जो उपादान ए शुचि न थाशे;
दोष को वस्तुनो अहवा उद्यम तणो, स्वामी सेवा सही निकट लाशे    ।।4।। 

स्वामी गुण ओळखी स्वामीने जे भजे, दरिशण शुद्धता तेह पामे;
ज्ञान चारित्र तप वीर्य उल्लासथी, कर्म जीती वसे मुक्ति धामे    ।।5।।
 
जगत वत्सल महावीर जिनवर सुणी, चित्त प्रभुचरणने शरण वास्यो;
तार जो बापजी बिरुद निज राखवा, दासनी सेवना रखे जोशो     ।।6।।
 
विनती मानजो शक्ति ए आपजो, भाव स्याद्वादता शुद्ध भासे;
साधी साधक दशा सिद्धता अनुभवी, देवचंद्र विमल प्रभुता प्रकाशे.     ।।7।।


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अर्थ 1 : संसार के दुःख से उद्विग्न बना हुआ मुमुक्षु आत्मा श्री महावीर परमात्मा से अफनी दीन-दुःखी अवस्था का वर्णन करता हुआ प्रार्थना करता है, हे दीनदयाल ! करुणा सागर ! प्रभो ! आप इस दीन-दुःखी दास पर दया वरसाकर उसे संसार-सागर से तारो-पार उतारो। यद्यपि, यह सेवक अनेक अवगुणों-दोषों से भरा हुआ है, राग-द्वैषदि से रंगा हुआ है तो भी इसे आप अपना सेवक-शरणागत मानकर इस पर कृषादृष्टि करो और इसे संसार-सागर से पार उतारकर जगत् में महान् सुयश-कीर्ति को प्राप्त करो । यही मेरी भावभरी विनम्र प्रार्थना है।

तार हो तार प्रभु मुज सेवक भणी, जगतमां एटलुं सुजश लीजे;
दास अवगुण भर्यो जाणी पोता तणो, दयानिधि दीन पर दया कीजे    ।।1।।

अर्थ 2 : हे प्रभो ! आपका यह सेवक राग-द्वेष से भरा हुआ है, मोहशत्रु से दबा हुआ है, लोक-प्रवाह में रंगा हुआ है अर्थात् सदा लोकरंजन में कुशल है, क्रोध के वशीभूत होकर धमधमा रहा है, शुद्ध ज्ञान-दर्शन-चारित्र या क्षमादि गुणों में तन्मय नहीं बन रहा है, परन्तु विषयों में आसक्त बनकर भवभ्रमण कर रहा है।

राग द्वेषे भर्यो मोह वैरी नड्यो, लोकनी रीतमां घणुंए रातो;
क्रोध वश धमधम्यो शुद्ध गुण नवि रम्यो, भम्यो भव मांहे हुं विषय मातो    ।।2।।

अर्थ 3 : भवभ्रमण करते-करते कभी मानवभव में आवश्यकादि द्रव्य क्रियाएँ लोकोपचार से की होगी अर्थात् विष, गरम और अन्योन्यानुष्ठानवाली क्रियाएँ की होगी तथा ज्ञानावरणीय के क्षयोपशम से शास्त्रों का कुछ अभ्यास भी किया होगा। परन्तु शुद्ध सत्तागत आत्मधर्म की शुद्धरूचि (श्रद्धान) बिना और आत्मगुण के आलम्बन बिना केवल बाह्यक्रिया द्वारा या स्पर्श अनुभवज्ञान बिना के शास्त्राभ्यास द्वारा सम्यग्दर्शन की प्राप्ति रूप कोई कार्य सिद्ध नहीं हुआ।

आदर्युं आचरण लोक उपचारथी, शास्त्र अभ्यास पण कांई कीधो;
शुद्ध श्रद्धा न वली आत्म अवलंब विण, तेहवो कार्य तिणे कोन सीधो    ।।3।।

अर्थ 4 : वीतराग परमात्मा के दर्शन (शासन) जैसा निर्मल पुष्ट-निमित्त प्राप्त करके भी यदि मेरी आत्मसत्ता पवित्र-शुद्ध न हो तो यह वस्तु-आत्मा का ही कोई दोष है अथवा मेरा जीवदल तो योग्य है किन्तु मेरे अपने पुरुषार्थ की ही कमी है? परन्तु अब तो स्वामीनाथ की सेवा ही मुझे प्रभु के पास ले जायेगी और मेरे एवं उनके बीच के अन्तर को तोड़ देगी।

स्वामी दरिसण समो निमित्त लही निरमलो, जो उपादान ए शुचि न थाशे;
दोष को वस्तुनो अहवा उद्यम तणो, स्वामी सेवा सही निकट लाशे    ।।4।।

अर्थ 5 : जो आत्मा अरिहन्त परमात्मा के गुणों को पहचान कर उनकी सेवा करता है, वह आत्मा शुद्ध सम्यग्दर्शन प्राप्त करता है और ज्ञान (यथार्थ-अवबोध), चारित्र (स्वरूप-रमणता), तप (तत्त्व एकाग्रता) वीर्य (आत्मशक्ति) गुण के उल्लास द्वारा क्रमशः सब कर्मों को जीतकर मोक्ष (मुक्ति) मन्दिर में जा बसता है।

स्वामी गुण ओळखी स्वामीने जे भजे, दरिशण शुद्धता तेह पामे;
ज्ञान चारित्र तप वीर्य उल्लासथी, कर्म जीती वसे मुक्ति धामे    ।।5।।

अर्थ 6 : महावीर परमात्मा तीनों जगत् के हितकर्ता हैं । ऐसा सुनकर मेरे चित्त ने आपके चरणों की शरण स्वीकार की है। अतः हे जगतात ! हे रक्षक ! हे प्रभो ! आप अपनी तारकता के विरुद्ध को सार्थक करने के लिए भी मुझे इस संसार-सागर से तारियेगा। परन्तु, दास की सेवा-भक्ति की तरफ ध्यान मत दिजियेगा अर्थात् यह सेवक तो मेरी सेवा-भक्ति ठीक से नहीं करता, ऐसा जानकर मेरी उपेक्षा मत करियेगा। मेरी सेवा की तरफ देखे बिना केवल आपके ‘तारक’ विरुद को सार्थक करने के लिए मुझे तारियेगा-पार उतारिएगा।

जगत वत्सल महावीर जिनवर सुणी, चित्त प्रभुचरणने शरण वास्यो;
तार जो बापजी बिरुद निज राखवा, दासनी सेवना रखे जोशो     ।।6।।

अर्थ 7 : हे कृपालु देवे ! मेरी एक छोटी-सी विनती को आप अवश्य स्वीकार करें और मुझे ऐसी शक्ति दें कि जिससे मैं वस्तु के सब धर्मों को तनिक भी शंकादि दूषण रखे बिना यथार्थरूप से जान सकूँ और साधक-दशा को सिद्ध कर सिद्ध-अवस्था का अनुभव कर सूकँ तथा देवों में चन्द्र समान उज्वल प्रभुता को प्रकटित कर सूकँ। स्याद्वाद के ज्ञान से साधकता प्रकटित होती है और साधकता से सिद्धता प्राप्त होती है।

विनती मानजो शक्ति ए आपजो, भाव स्याद्वादता शुद्ध भासे;
साधी साधक दशा सिद्धता अनुभवी, देवचंद्र विमल प्रभुता प्रकाशे.     ।।7।।


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पार्श्वनाथ प्रभु सवायो Parshwa prabhu Sawayo - Parshwanath song jain stavan

|| Parshwa prabhu Sawayo Devchandraji Jain stavan SONG ||
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 Parshwa prabhu Sawayo स्तवन सांग

जैन स्तवन


श्री पार्श्वनाथ भगवान् स्तवन Devchandraji jain stavan

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पार्श्वनाथ प्रभु सवायो Parshwa prabhu Sawayo
Devchandraji krut chovishi






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||  पार्श्वनाथ प्रभु सवायो Parshwa


 prabhu Sawayo ||  


सहज गुण आगरो स्वामी सुख सागरो; ज्ञान वईरागरो प्रभु सवायो;
शुद्धता एकता तीक्ष्णता भावथी, मोहरिपु जीती जय पडह वायो     ।।1।। 

वस्तु निज भाव अविभास नि:कलंकता, परिणति वृत्तिता करी अभेदे;
भाव तादात्म्यता शक्ति उल्लासथी, संतति योगने तुं उच्छेदे     ।।2।। 

दोष गुण वस्तुनो लखीय यथार्थता, लही उदासीनता अपर भावे;
ध्वंसि तज्जन्यता भाव कर्त्तापणुं, परम प्रभु तुं रम्यो निज स्वभावे     ।।3।। 

शुभ अशुभ भाव अविभास तहकीकता, शुभ अशुभ भाव तिहां प्रभु न कीधो;
शुद्ध परिणामता वीर्य कर्त्ता थई, परम अक्रियता अमृत पीधो     ।।4।। 

शुद्धता प्रभुतणी आत्मभावे रमे, परम परमात्मता तास थाये;
मिश्र भावे अछे त्रिगुणनी भिन्नता, त्रिगुण एकत्व तुज चरण आये     ।।5।। 

उपशम रसभरी सर्व जन शंकरी, मूर्ति जिनराजनी आज भेटी;
कारणे कार्य निष्पत्ति श्रद्धान छे, तिणे भव भ्रमणनी भीड मेटी     ।।6।। 

नयर खंभायते पार्श्व प्रभु दरशने, विकसते हर्ष उत्साह वाध्यो;
हेतु एकत्वता रमण परिणामथी, सिद्धि साधकपणो आज साध्यो     ।।7।। 

आज कृतपुण्य धन्य दीह माहरो थयो, आज नर जन्म में सफल भाव्यो;
देवचंद्र स्वामी त्रेवीशमो वंदीयो, भक्तिभर चित्त तुज गुण रमाव्यो     ।।8।।


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अर्थ 1 : प्रभु कैसे हैं? यह बताते हैं। सहज स्वाभाविक गुणों के धाम हैं, अव्याबाध, अविनाशी सुख के सिन्धु हैं, ज्ञानरुप वज्र-हीरा की खान है, सवाया-साद सर्वश्रेष्ठ हैं। ऐसे श्री पार्श्वनाथ भगवान् ने शुद्धता (सम्यग्ज्ञान की निर्मलता), एकता (स्वरुप तन्मयता) और तीक्ष्णता (वीर्यगुण की तीव्रता) के भाव द्वारा मोहशत्रु को जीतकर जय पडह-विजय का डंका बजाया है।

सहज गुण आगरो स्वामी सुख सागरो; ज्ञान वईरागरो प्रभु सवायो;
शुद्धता एकता तीक्ष्णता भावथी, मोहरिपु जीती जय पडह वायो     ।।1।।

अर्थ 2 : अब शुद्धता, एकता और तीक्ष्णता की व्याख्या बताते हैं। वस्तु के स्वरुप का यथार्थ ज्ञान, यह निशष्कलंकता शुद्धता है। आत्मपरिणति में वृत्ति का अभेद, यह एकता है और तादात्म्य भाव से रही हुई वीर्य-है।

वस्तु निज भाव अविभास नि:कलंकता, परिणति वृत्तिता करी अभेदे;
भाव तादात्म्यता शक्ति उल्लासथी, संतति योगने तुं उच्छेदे     ।।2।।

अर्थ 3 : वस्तु के गुण-दोषों की यथार्थता जानकर परभाव से उदासीन होकर और तदुत्पत्ति सम्बन्ध से उत्पन्न अर्थात् पुद्गल के सम्बन्ध से पेदा हुए विभाग-कर्तुत्व का नाश करके हे प्रभो! आप अपने परम शुद्ध स्वभाव में रमण कर रहे हैं।

दोष गुण वस्तुनो लखीय यथार्थता, लही उदासीनता अपर भावे;
ध्वंसि तज्जन्यता भाव कर्त्तापणुं, परम प्रभु तुं रम्यो निज स्वभावे     ।।3।।

अर्थ 4 : शुभ अथवा अशुभ भाव की यथार्थ (निश्चित) पहचान करके शुभ या अशुभ पदार्थों में हे प्रभो! आपने शुभाशुभ भाव अर्थात् राग-द्वेष नहीं किया परन्तु शुद्ध पारिणामिक-भाव में वीर्यगुण को प्रवर्तितकर परम अक्रियतारुप अमृतरस का पान किया है।

शुभ अशुभ भाव अविभास तहकीकता, शुभ अशुभ भाव तिहां प्रभु न कीधो;
शुद्ध परिणामता वीर्य कर्त्ता थई, परम अक्रियता अमृत पीधो     ।।4।।
अर्थ 5 : प्रभु की पूर्ण शुद्धता का जो जीव आत्म-स्वभाव में अभेद भाव से चिन्तर कर ध्यान द्वारा उसमें ही रमण करता है अर्थात् मेरी आत्मा भी सत्तारुप से पूर्ण शुद्ध स्वरुप है। ऐसा निश्चय कर प्रभु की पूर्ण शुद्धता में तन्म्य बनता है, उसे वैसी ही परम परमात्म-दिशा प्राप्त होती है। क्षयोपशमभाव में ज्ञान-दर्शन-चारित्र की भिन्नता मालूम होत है परन्तु क्षायिक यथाख्यात चारित्र प्राप्त होने पर तीनों गुणों की एकरुपता हो जाती है।

शुद्धता प्रभुतणी आत्मभावे रमे, परम परमात्मता तास थाये;
मिश्र भावे अछे त्रिगुणनी भिन्नता, त्रिगुण एकत्व तुज चरण आये     ।।5।।

अर्थ 6 : उपशम-सुधारस से परिपूर्ण और सर्व जीवों को सुख देनेवाली श्री जिनेश्वर प्रभु की मूर्ति के साक्षात्कार से अर्थात् आज उसके दर्शन-वन्दन-सेवन अपूर्व हर्षाोल्लास के साथ करने से ऐसी दृढ प्रतीति हो गई है कि, मोक्ष के पुष्ट-निमित्त कारणरुप जिनदर्शन और जिनसेवा का योग मिला है, उससे मोक्षरुप कार्य की सिद्धि अवश्य होगी। ऐसी दृढ प्रतीति होने के साथ ही मेरे भवभ्रमण का भय भी भाग गया (कारण में कार्य का उपचार करके हर्षावेश से निकला हुआ कवि का यह अनुभव वचन है)।

उपशम रसभरी सर्व जन शंकरी, मूर्ति जिनराजनी आज भेटी;
कारणे कार्य निष्पत्ति श्रद्धान छे, तिणे भव भ्रमणनी भीड मेटी     ।।6।।

अर्थ 7 : खम्भात नगर में बिराजमान श्री सुखसागर पार्श्वनाथ प्रभु के दर्शन-वन्दन करते समय रोमराजि विकसित होने के अपूर्व हर्ष और उत्साह की उर्मियां उत्पन्न होने लगी और श्री अरिहन्त परमात्मा के साथ ध्यान द्वारा तन्मयता सिद्ध होने से आत्म-रमणता प्राप्त हुई। इससे अनुमान होता है कि सिद्धि की साधकता मेरी आत्मा में प्रकटित हुई है।

नयर खंभायते पार्श्व प्रभु दरशने, विकसते हर्ष उत्साह वाध्यो;
हेतु एकत्वता रमण परिणामथी, सिद्धि साधकपणो आज साध्यो     ।।7।।

अर्थ 8 : देवों में चन्द्र समान समुज्जवल श्री पार्श्वनाथ प्रभु को भावपूर्वक वन्दन किया और भक्ति से भरपूर चित्त प्रभु के गुण में रमण करने लगा। इसलिए आज मेरा महान पुण्योदय जागृत हुआ है। आज का यह दिन धन्य बना है। और सचमुच ! आज मेरा यह जन्म भी सफल बन गया है।

आज कृतपुण्य धन्य दीह माहरो थयो, आज नर जन्म में सफल भाव्यो;
देवचंद्र स्वामी त्रेवीशमो वंदीयो, भक्तिभर चित्त तुज गुण रमाव्यो     ।।8।।



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Monday, September 28, 2020

24 Tirthankar Vandana Jain stuti २४ तीर्थंकर वंदना

|| 24 Tirthankar Vandana LYRICS ||

२४ तीर्थंकर वंदना जैन स्तवन

24 Tirthankar Vandana LYRICS JAIN STAVAN SONG ||

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२४ तीर्थंकर वंदना  लिरिक्स 

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