ॐ
ॐ श्री शांतिधारा पाठ ॐ
महाप्राभाविक बीजमंत्रगर्भित · परम चमत्कारी · सर्वकार्य सिद्धिदायक
श्री शांतिधारा पाठ जैन परम्परा का एक अत्यंत प्रभावशाली, बीजमंत्रगर्भित स्तोत्र है, जिसका पाठ मुख्यतः श्री शान्तिनाथ भगवान तथा श्री पार्श्वनाथ भगवान की भक्ति एवं शान्तिधारा के अवसर पर किया जाता है। इसमें अर्हम्, ह्रीँ, क्ष्वीँ जैसे शक्तिशाली बीजाक्षर, श्री पद्मावती-चक्रेश्वरी-ज्वालामालिनी आदि शासन-देवियों का आवाहन, तथा समस्त विघ्न, रोग, भय एवं उपद्रवों के शमन की प्रार्थना समाहित है। श्रद्धा और शुद्ध उच्चारण के साथ किया गया इसका पाठ मन को शान्ति, घर में मंगल तथा सर्वकार्य में सिद्धि प्रदान करने वाला माना जाता है।
सर्व विघ्न शान्तिरोग व भय निवारणधन-धान्य समृद्धिसर्वकार्य सिद्धिघर-घर में मंगल
ॐ ह्रीँ श्रीँ क्लीँ ऐँ अर्हम् वं मं हं संं तं
वं वं मं मं हं हं सं सं तं तं डं डं म्वीँ म्वीँ
क्ष्वीँ क्ष्वीँ द्रां द्रों द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय नमोऽर्हते
भगवते श्रीमती ॐ ह्रीँ क्रौँ मम पापं खंडय खंडय
हन हन दह दह पच पच पाचय पाचय सिद्धिं कुरु कुरु स्वाहा॥
वं वं मं मं हं हं सं सं तं तं डं डं म्वीँ म्वीँ
क्ष्वीँ क्ष्वीँ द्रां द्रों द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय नमोऽर्हते
भगवते श्रीमती ॐ ह्रीँ क्रौँ मम पापं खंडय खंडय
हन हन दह दह पच पच पाचय पाचय सिद्धिं कुरु कुरु स्वाहा॥
ॐ नमोऽर्ह डं म्वीँ क्ष्वीँ हं संं डं वं वः
पः हः क्षाँ क्षीँ क्षुँ क्षूँ क्षेँ क्षोँ क्षौँ क्षँ क्षः ङः॥
ॐ हँ हाँ हिँ हीँ हुँ हूँ हृँ हैँ हॉँ हौँ हूँ हः
असिआउसाय नमः मम पूजकस्य ऋद्धिं वृद्धिं कुरु स्वाहा॥
पः हः क्षाँ क्षीँ क्षुँ क्षूँ क्षेँ क्षोँ क्षौँ क्षँ क्षः ङः॥
ॐ हँ हाँ हिँ हीँ हुँ हूँ हृँ हैँ हॉँ हौँ हूँ हः
असिआउसाय नमः मम पूजकस्य ऋद्धिं वृद्धिं कुरु स्वाहा॥
ॐ नमोऽर्हते भगवते श्रीमते डः डः मम श्रीरस्तु वृद्धिरस्तु तुष्टिरस्तु पुष्टिरस्तु शान्तिरस्तु कान्तिरस्तु कल्याणमस्तु मम कार्यसिद्ध्यर्थं सर्वविघ्ननिवारणार्थं श्रीमद् भगवते सर्वोत्कृष्ट-त्रैलोक्यनाथार्चितपाद पद्म अर्हत् परमेष्ठि जिनेन्द्र-देवाधिदेवाय नमो नमः मम श्री शान्तिदेव-पादपद्म-प्रसादात् सधर्म-श्री-खलायुरारोग्यै-श्वर्याभिवृद्धिरस्तु स्वस्तिरस्तु धन-धान्य-समृद्धिरस्तु श्री शान्तिनाथो मां प्रति प्रसीदतु श्री वीतराग देवो मां प्रति प्रसीदतु; श्री जिनेन्द्र परम-मांगल्य-नामधेयो ममेहामुत्र च सिद्धिं तनोतु॥
ॐ नमोऽर्हते भगवते भगवते श्रीमते श्रीचिंतामणि - पार्श्वनाथाय तीर्थंकराय, रत्नत्रय रूपाय, अनन्त-चतुष्टय सहिताय, धरणेन्द्र-फण-मौलि-मण्डिताय, समवसरण-लक्ष्मी शोभिताय, ईन्द्र धरणेन्द्र-चक्रवर्त्यादि पूजित-पादपद्माय, केवलज्ञान-लक्ष्मी शोभिताय, जिनराज-महादेवाष्टदशदोष-रहिताय, षट्ऋ चत्वरिंशद्-गुण-संयुक्ताय, परमगुरु परमात्मने, सिद्धाय, बुद्धाय त्रैलोक्यमोहनाय, धरणेन्द्र-पद्मावती-सहिताय, अचल-बल-वीर्य-पराक्रमाय-अनेक दैत्य-दानव-कोटि-मुकुट-घृष्ट पाद-पीठाय, ब्रह्मा-विष्णु रुद्र-नारद-खेचर-पूजिताय, सर्व-भव्यजनानन्दकराय, सर्व जीव-विघ्न-निवारण-समर्थाय, श्री पार्श्वनाथ-देवाधिदेवाय नमोस्तु ते श्री जिनराज-पूजन-प्रसादाद् मम सेवकस्य सर्वदोष-रोग-शोक-भय-पीडा-विनाशनं कुरु कुरं, सर्वशान्तिं-तुष्टिं कुरु कुरु स्वाहा॥
ॐ नमो श्री शान्तिदेवाय सर्वारिष्टशान्तिकराय, हाँ ह्रीँ हूँ हैँ हः असिआउसा मम सर्व विघ्न शान्तिं कुरु कुरु श्री संघस्य (अमुकस्य) मम तुष्टि पुष्टिं कुरु कुरु स्वाहा॥
विघ्न-दोष-छेदन (छिन्धि छिन्धि)
श्री पार्श्वनाथ-पूजन-प्रसादाद् मम अशुभान् पापान् छिन्धि छिन्धि॥ मम अशुभ-कर्मोपार्जित-दुःखान् छिन्धि छिन्धि॥ मम पर-दुष्ट-जन-कृत मंत्र-तंत्र-हृष्टि-पुष्टि-छल-छिद्रादि दोषान् छिन्धि छिन्धि॥ मम अग्नि-चोर-जल-सर्प-व्याधि छिन्धि छिन्धि॥ मारी कृतोपद्रवान् छिन्धि छिन्धि॥ डाकिनी शाकिनी भूत भैरवादिकृतोपद्रवान् छिन्धि छिन्धि॥ सर्वभैरव-देवदानव वीरनरनार-सिंह-योगिनी-कृत विघ्नान् छिन्धि छिन्धि॥ भुवनवासि-व्यंतर-ज्योतिषी देवदेवी कृतदोषान् छिन्धि छिन्धि॥ अग्निकुमार-कृतविघ्नान् छिन्धि छिन्धि॥ दीपकुमार भयान् छिन्धि भिन्छि भिन्छि॥ वातकुमार-मेघकुमार कृत-विघ्नान् छिन्धि छिन्धि भिन्छि भिन्छि॥ ईन्द्रादि-दश-दिक्पालदेव-कृतविघ्नान् छिन्धि छिन्धि॥ जय-विजय-अपराजित माणिभद्र-पूर्ण-भद्रादि क्षेत्रपाल-कृत-विघ्नान् छिन्धि छिन्धि॥ राक्षस वैताल-दैत्य-दानव-यक्षादिकृत-दोषान् छिन्धि छिन्धि॥ नवग्रहकृत ग्राम-नगर-पीडां छिन्धि छिन्धि॥ सर्व-अष्ट-कुलनाग-जनित-विष-भयान् सर्वग्राम नगर देश-रोगान् छिन्धि छिन्धि॥ सर्व-स्थावर-जंगम-वृश्चिक-हृष्टिविष जातिसर्प्पादिकृत-विषदोषान् छिन्धि छिन्धि॥ सर्व-सिंहाष्टापद व्याघ्र-व्याल-वचचर-जीवभयान् छिन्धि छिन्धि॥ परशत्रुकृत मारणोच्चाटन-विद्वेषण-मोहन-वशीकरणादि दोषान् छिन्धि छिन्धि, भिन्धि भिन्धि॥ सर्व-देशपुर-मारी छिन्धि छिन्धि॥ सर्व गो-वृषभादि-तिर्यग्मारी छिन्धि छिन्धि॥ सर्व-वृक्ष-फल पुष्प-लता-मारीं छिन्धि छिन्धि॥
श्री पद्मावती देवी आवाहन
ॐ नमो भगवति चक्रेश्वरि ज्वालमलिनी पद्मावती देवी अस्मिन् जिनेन्द्रभुवने आगच्छ २, एहि २ तिष्ठ २॥ बलिं गृहाण २॥ मम धन-धान्य-समृद्धिं कुरु २, सर्व भव्य-जीवानन्दं कुरु २॥ सर्वदेश-ग्रामपुर-मध्य-क्षुद्रोपद्रव-सर्व-दोष-मृत्यु-पीडा विनाशनं कुरु २॥ सर्व-परचक्रभय-निवारणं कुरु २॥ सर्व-देश-ग्राम-पुर-मध्य-सुभिक्षं कुरु २॥ सर्व विघ्न-शान्तिं कुरु २॥ स्वाहा॥
ॐ आँ क्रौँ ह्रीँ श्रीँ वृषभादि वर्धमानान्त-चतुर्विंशति-तीर्थंकर-महादेवाः प्रीयंतां २, मम पापानि शाम्यन्तु, घोरोपसर्गाः सर्व विघ्नाः शाम्यन्तु॥
ॐ आँ क्रौँ ह्रीँ श्रीँ रोहिण्यादि महादेव्यः अत्र आगच्छन्तु २॥ सर्वदेवताः प्रीयंतां २॥ ॐ आँ-क्रौँ - ह्रीँ श्रीँ चक्रेश्वरी ज्वालामालिनी पद्मावती महादेवी प्रीयंतां २॥
ॐ आँ क्रौँ ह्रीँ श्रीँ माणिभद्रादि अक्षकुमार देवाः प्रीयंतां २॥ सर्व जिनशासनरक्षकदेवाः प्रीयंतां २, श्री आदित्य-सोम मंगल-बुध-बृहस्पति-शुक्र-शनि-राहु-केतवः सर्वे नवग्रहः प्रीयंतां प्रसीदन्तु देशस्य राष्ट्रस्य पुरस्य राज्ञः करोतु शान्तिं भगवान् जिनेन्द्रः॥
यत्सुखं त्रिषु लोकेषु, व्याधि-व्यसन-वर्जित।
अभयं क्षेममारोग्यं, स्वस्तिरस्तु च मे सदा॥१॥
अभयं क्षेममारोग्यं, स्वस्तिरस्तु च मे सदा॥१॥
यदर्थं क्रियते कर्म, सप्रेति नित्यमुत्तमं।
शांतिकं पौष्टिकं चैव, सर्व कार्येषु सिद्धिदं॥२॥
शांतिकं पौष्टिकं चैव, सर्व कार्येषु सिद्धिदं॥२॥
|| इति श्री शान्तिधारा पाठः समाप्तः ||
पाठ-विधि: स्नान कर, शुद्ध वस्त्र धारण कर, पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख कर के शान्त चित्त से इस पाठ का उच्चारण करें। बीजाक्षरों का उच्चारण धीरे, स्पष्ट एवं श्रद्धापूर्वक करें।
अर्थ एवं भावार्थ
प्रारम्भिक बीज-मंत्र आवाहन: श्री अरिहंत परमात्मा को नमस्कार करते हुए पापों के नाश (“पापं खंडय”) तथा कार्य-सिद्धि (“सिद्धिं कुरु”) की प्रार्थना की गई है। ह्रीँ, श्रीँ, क्लीँ, क्ष्वीँ आदि बीजाक्षर मंत्र-शक्ति के आधार हैं।
पंच-परमेष्ठी बीज (असिआउसा): “असिआउसा” पंच परमेष्ठी का बीज है — अ=अरिहंत, सि=सिद्ध, आ=आचार्य, उ=उपाध्याय, सा=साधु। इन्हें नमस्कार कर पाठक की ऋद्धि-वृद्धि की कामना की गई है।
मंगल-कामना: मुझे श्री, वृद्धि, तुष्टि, पुष्टि, शान्ति, कान्ति एवं कल्याण प्राप्त हो; समस्त विघ्नों का निवारण हो; श्री शान्तिनाथ तथा वीतराग देव मुझ पर प्रसन्न हों; इस लोक एवं परलोक (“इहामुत्र”) दोनों में सिद्धि प्राप्त हो — यही प्रार्थना है।
श्री चिन्तामणि पार्श्वनाथ स्तुति: भगवान पार्श्वनाथ की विस्तृत स्तुति — रत्नत्रय-स्वरूप, अनन्त-चतुष्टय-युक्त, धरणेन्द्र-पद्मावती सहित, अठारह दोषों से रहित एवं केवलज्ञान-लक्ष्मी से सुशोभित। इनकी पूजा के प्रसाद से सेवक के समस्त दोष, रोग, शोक, भय एवं पीड़ा का विनाश तथा सर्व शान्ति व तुष्टि की याचना।
शान्तिदेव आवाहन: सर्व अरिष्टों (अनिष्टों) को शान्त करने वाले श्री शान्तिदेव को नमस्कार; अपने तथा श्री संघ की तुष्टि-पुष्टि की कामना। (“अमुकस्य” के स्थान पर पाठक अपना अथवा जिसके लिए पाठ कर रहे हों उसका नाम बोलते हैं।)
छिन्धि छिन्धि (विघ्न-छेदन): यह भाग समस्त प्रकार के भय, रोग, उपद्रव एवं दोषों के नाश की प्रार्थना है — अग्नि, चोर, जल, सर्प, महामारी, डाकिनी-शाकिनी-भूत, क्षेत्रपाल, नवग्रह, विष तथा हिंसक जीवों से उत्पन्न भय; एवं शत्रु द्वारा किये गये मारण-उच्चाटन-विद्वेषण-मोहन-वशीकरण आदि अभिचार। “छिन्धि” का अर्थ है — काट दो, नष्ट कर दो।
श्री पद्मावती आवाहन: श्री चक्रेश्वरी, ज्वालामालिनी एवं पद्मावती देवी का आवाहन — जिनालय में पधारें, बलि ग्रहण करें, धन-धान्य-समृद्धि प्रदान करें, परचक्र (शत्रु-सेना) के भय का निवारण करें तथा समस्त विघ्नों की शान्ति करें।
चौबीस तीर्थंकर एवं देव-देवी प्रसन्नता: श्री वृषभ (ऋषभदेव) से लेकर श्री वर्धमान (महावीर स्वामी) पर्यन्त चौबीसों तीर्थंकर, रोहिणी आदि महादेवियाँ, माणिभद्रादि देव, समस्त जिनशासन-रक्षक देव एवं नवग्रह प्रसन्न हों; भगवान जिनेन्द्र देश, राष्ट्र, नगर एवं शासक को शान्ति प्रदान करें।
समापन श्लोक: तीनों लोकों का सुख, निरोगता, अभय एवं कल्याण सदा प्राप्त हो। यह पाठ शान्तिक (शान्ति देने वाला) एवं पौष्टिक (पुष्टि देने वाला) होकर सर्वकार्य में सिद्धि प्रदान करने वाला है।
Meaning in English
The path opens with seed-syllable (bīja) salutations to the Arihant, praying that sins be destroyed and one's aims accomplished. The syllables A-Si-Aa-U-Sa honour the five supreme beings — Arihant, Siddha, Āchārya, Upādhyāya and Sādhu — with a prayer for the reciter's prosperity and growth. There follows a prayer for prosperity, contentment, peace, radiance and welfare, and for the removal of every obstacle, invoking the grace of Śrī Śāntinātha and the Vītarāga. An extended praise of Śrī Chintāmaṇi Pārśvanātha — embodiment of the three jewels, endowed with the four infinitudes, attended by Dharaṇendra and Padmāvatī, free of the eighteen faults and radiant with omniscience — asks that all faults, disease, sorrow, fear and pain of the devotee be removed. The “chindhi chindhi” litany then asks that every fear, disease, affliction and hostile act — fire, thief, water, snake, epidemic, malevolent spirits, planetary harm, poison and enemy sorcery — be cut away. The guardian goddesses Chakreśvarī, Jvālāmālinī and Padmāvatī are invoked for wealth, protection from enemy forces and the pacifying of all obstacles. Finally, the twenty-four Tīrthaṅkaras (from Ṛiṣabha to Mahāvīra), the goddesses, the guardian deities and the nine planets are asked to be pleased, and Jinendra is asked to grant peace to land, nation, city and ruler. The closing verses invoke the happiness of the three worlds, fearlessness, health and lasting well-being, declaring the rite to be śāntika (peace-giving) and pauṣṭika (nourishing), granting success in all endeavours.
मुख्य शब्दार्थ · Key Terms
असिआउसा — पंच परमेष्ठी बीज — अ=अरिहंत, सि=सिद्ध, आ=आचार्य, उ=उपाध्याय, सा=साधु।
छिन्धि छिन्धि — “काट दो, नष्ट कर दो” — विघ्न/दोष के नाश की प्रार्थना।
प्रीयन्तां — “प्रसन्न हों” — देव-देवी की प्रसन्नता हेतु।
कुरु कुरु — “करो, करो” — प्रार्थना की पुनरुक्ति।
मंत्र में “२” — जहाँ अंक “२” लिखा है वहाँ उस शब्द को दो बार बोलना चाहिए (जैसे “आगच्छ २” = आगच्छ आगच्छ)।
स्वाहा — आहुति एवं समर्पण-सूचक मंत्र-पद।
छिन्धि छिन्धि — “काट दो, नष्ट कर दो” — विघ्न/दोष के नाश की प्रार्थना।
प्रीयन्तां — “प्रसन्न हों” — देव-देवी की प्रसन्नता हेतु।
कुरु कुरु — “करो, करो” — प्रार्थना की पुनरुक्ति।
मंत्र में “२” — जहाँ अंक “२” लिखा है वहाँ उस शब्द को दो बार बोलना चाहिए (जैसे “आगच्छ २” = आगच्छ आगच्छ)।
स्वाहा — आहुति एवं समर्पण-सूचक मंत्र-पद।



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