Sunday, August 27, 2023

Sri Munisuvratswami jehti Nijpad Siddhi Olagadi toh kije Devchandraji chovisi श्री मुनिसुव्रत

||  श्री मुनिसुव्रतस्वामीनी रे, जेहथी निजपद सिद्धि LYRICS - JAIN STAVAN SONG ||
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Munisuvratswami jehti Nijpad Siddhi स्तवन स्तवन सांग

जैन स्तवन


श्री मुनिसुव्रत भगवान् स्तवन Devchandraji jain stavan

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Sri Munisuvratswami jehti Nijpad Siddhi Olagadi toh kije
Devchandraji chovisi श्री मुनिसुव्रत  




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||  श्री मुनिसुव्रत जेहथी निजपद


 सिद्धि||  


ओलगडी, तो कीजे श्री मुनिसुव्रतस्वामीनी रे, जेहथी निजपद सिद्धि;
केवल ज्ञानादिक गुण उल्लसे रे, लहिये सहज समृद्धि     ।।1।।
 
उपादान उपादान निज परिणति वस्तुनी रे, पण कारण निमित्त आधीन;
पुष्ट अपुष्ट दुविध ते उपदिश्यो रे, ग्राहक विधि आधीन     ।।2।।
 
साध्य असाध्य धर्म जे मांही हुवे रे, ते निमित्त अति पुष्ट;
पुष्पमांहि तिलवासक वासना रे, ते नहि प्रध्वंसक दुष्ट     ।।3।।
 
दंड-दंड निमित्त अपुष्ट घडा तणो रे, नवि घटता तसु मांहि;
साधक साधक प्रध्वंसकता अछे रे, तिणे नहि नियत प्रवाह     ।।4।।

षट्कारक षट्कार ते कारण कार्यनो रे, जे कारण स्वाधीन;
ते कर्त्ता ते कर्त्ता सहु कारक ते वसु रे, कर्म ते कारण पीन     ।।5।।
 
कार्य कार्य संकल्पे कारकदशा रे, छती सत्ता सद्भाव;
अथवा तुल्य धर्मने जोयवे रे, साध्यारोपण दाव     ।।6।।
 
अतिशय अतिशय कारण कारक करण ते रे, निमित्त अने उपादान;
संप्रदान संप्रदान कारण पद भवनथी रे, कारण व्यय अपादान     ।।7।।
 
भवन भवन व्यय विण कारज नवि होवे रे, जिम द्रषदे न घटत्व;
शुद्धाधार शुद्धाधार स्वगुणनो द्रव्य छे रे, सत्ताधार सुतत्त्व     ।।8।।
 
आतम आतम कर्त्ता कार्य सिद्धता रे, तसु साधन जिनराज;
प्रभु दीठे प्रभु दीठे कारज रुचि उपजेरे, प्रगटे आत्म साम्राज    ।।9।। 

वंदन वंदन नमन सेवन वली पूजना रे, समरण स्तवन वली ध्यान;
देवचंद्र देवचंद्र कीजे जिनराजनो रे, प्रगटे पूर्ण निधान     ।।10।।


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अर्थ 1 : श्री मुनिसुव्रत भगवान् की ओलगडी-सेवा अर्थात् गुणगान अवश्य करना चाहिए जिससे आत्मा का परमानन्द पर सिद्ध हो। केवलज्ञानादि गुण प्रकट हो और सहज आत्म-सम्पत्ति प्राप्त हो।

ओलगडी, तो कीजे श्री मुनिसुव्रतस्वामीनी रे, जेहथी निजपद सिद्धि;
केवल ज्ञानादिक गुण उल्लसे रे, लहिये सहज समृद्धि     ।।1।।
अर्थ 2 : उपादान वस्तु की निज-परिणति अर्थात् वस्तु का मूल धर्म है परन्तु वह निमित्त-कारण के आधीन है अर्थात् निमित्त योग से उपादान शक्ति जागृत होती है। उस निमित्त-कारण के पुष्ट-निमित्त और अपुष्ट-निमित्त ऐसे हो भेद आगम में बताये गयें हैं। वह निमित्त कर्ता की विधिपूर्वक की गई क्रिया के आधीन है अर्थात् कर्ता यदि निमित्त का विधिपूर्वक कार्य करने में उपयोग ककरे तो निमित्त कार्यकर बनता है, इसके बिना निमित्त कार्य नहीं कर सकता।

उपादान उपादान निज परिणति वस्तुनी रे, पण कारण निमित्त आधीन;
पुष्ट अपुष्ट दुविध ते उपदिश्यो रे, ग्राहक विधि आधीन     ।।2।।
अर्थ 3 : जिस कारण में साध्य-धर्म (कार्यधर्म) विद्यमान हो, उसे पुष्ट-निमित्त कारण कहा जाता है। जैसे कि, फूल में तेल को वासित बनाने रूप कार्य-धर्म वासना (सुगंध) विद्यमान है परन्तु तेल की वासना की ध्वंस करने की दुष्टता नहीं हैं अर्थात् पुष्प तेल को अधिक सुगंधित बनाने का पुष्ट-कारण है। इसी तरह श्री अरिहन्त परमात्मा मोक्षरूप कार्य में पुष्ट-निमित्तकारण हैं अतः मोक्ष की अभिलाषा से जो विधिपूर्वक उनकी सेवा करता है, वह अवश्य मोक्ष प्राप्त करता है।

साध्य असाध्य धर्म जे मांही हुवे रे, ते निमित्त अति पुष्ट;
पुष्पमांहि तिलवासक वासना रे, ते नहि प्रध्वंसक दुष्ट     ।।3।।
अर्थ 4 : जिस कारण में साध्य-धर्म विद्यमान न हो वह अपुष्ट-निमित्तकारण कहा जाता है। जैसे, दण्ड घटरूप कार्य में अपुष्ट-निमित्तकारण है क्योंकि, दण्ड में घटत्व विद्यमान नहीं है। कर्ता की इच्छा के अनुसार दण्ड घट की उत्पत्ति में जैसे कारणभूत है वेसे वही दण्ड घट के ध्वंस में भी कारणभूत बनता है, उपका कोई एक निश्चित प्रवाह नहीं है।

दंड-दंड निमित्त अपुष्ट घडा तणो रे, नवि घटता तसु मांहि;
साधक साधक प्रध्वंसकता अछे रे, तिणे नहि नियत प्रवाह     ।।4।।
अर्थ 5 : कर्ता आदि छहों कारक प्रत्येक कार्य की उत्पत्ति में कारण हैं। जहां कर्ता क्रिया करता है वहां सहजरूप से षट्कारक की उपस्थिति अवश्य होती है। (1) कार्य करने में जो स्वाधीन कारण हो और शेष सब कारक भी जिसके आधीन हो वह कर्ता कारक कहा जाता है। (2) जो कारण द्वारा पुष्ट होता है और जो करने से होता है वह कार्य (कर्म) कारक कहा जाता है।

षट्कारक षट्कार ते कारण कार्यनो रे, जे कारण स्वाधीन;
ते कर्त्ता ते कर्त्ता सहु कारक ते वसु रे, कर्म ते कारण पीन     ।।5।।
अर्थ 6 : प्रश्न : द्वितीय कर्म कारक को कारण कैसे कहा जा सकता है? यह तो स्वयं कार्यरूप है। उत्तर :- कर्ता सबसे पहले कार्य करने का संकल्प करता है। उदाहरण के लिए कर्ता ‘मुझे घट बनाना है’ ऐसा बुद्धि संकल्प करके कार्य प्रारंभ करता है अत एव संकल्प कार्य का कारण है। अथवा मूल उपादानकारण (मिट्टी) में (घटरूप) कार्य की योग्यता सत्ता में रही हुई है। अर्थात् सत्तागत कार्यत्त्व प्राग्भावी काय4 का कारण है। अथवा, तुल्य-समान धर्म देखने से कार्य करने का संकल्प होता है। जैसे कि श्री जिनेश्वर प्रभु को देखकर भव्यात्माओं को विचार होता है कि, ‘मुझे ऐसा पूर्णानन्द स्वरूप प्राप्त करना है।’ इस प्रकार कार्य को भी कारण कहा जा सकता है। इन युक्तियों से विचार करने पर जाना जा सकता है कि, साध्य का आरोपण करना यग कर्म में कारकपना है।

कार्य कार्य संकल्पे कारकदशा रे, छती सत्ता सद्भाव;
अथवा तुल्य धर्मने जोयवे रे, साध्यारोपण दाव     ।।6।।
अर्थ 7 : (3) उत्कृष्ट-प्रधानलकारण करण कारक है और वह निमित्त और उपादान के भेद से दो प्रकार का है। जैसे, मोक्षकार्य में उपादान आत्म-सत्ता है और निमित्त प्रभु-सेवा है। (4) कारण-पद (पर्याय) का (उत्पन्न होना) अर्थात् उपादानकारण अथवा कार्य में अपूर्व-अपूर्व कारण-पर्याय की उत्पत्ति-प्राप्ति होना सम्प्रदान कारक है। (5) पूर्व (पुरातन) कारण-पर्याय का व्यय-विनाश होना, यह अपादान कारक है। सम्प्रदान और अपादान में कारणता किस प्रकार है? यह आगे की गाथा मे बताते हैं।

अतिशय अतिशय कारण कारक करण ते रे, निमित्त अने उपादान;
संप्रदान संप्रदान कारण पद भवनथी रे, कारण व्यय अपादान     ।।7।।
अर्थ 8 : भवन अर्थात् नवीन पर्याय की उत्पत्ति और व्यय अर्थात् पूर्व पर्याय का नाश। यह हुए बिना कार्य की निष्पत्ति नहीं होती। जैसे कि दुषद् पत्थर में घटपर्याय की उत्पत्ति की योग्यता नहीं है इसलिए कुम्हार घट बनाने का प्रयत्न करे तोभी पत्थर से घट नहीं बन सकता। मिट्टी में भवन-व्यय की क्रिया होती है जैसे कि पिण्ड पर्याय का नाश और स्थास (थाली) पर्याय की उत्पत्तिः स्थासपर्याय का नाश और कोशपर्याय की उत्पत्ति इत्यादि क्रमशः कुशल-कपालपर्याय की उत्पत्ति और नाश होने पर घटकार्य उत्पन्न होता है। इस प्रकार मोक्ष-सिद्धातारूप कार्य में भी पहले मिथ्यात्वपर्याय का नाश और सम्यक्त्व-पर्याय की उत्पत्ति आदि भवन-व्यय की प्रक्रिया होने पर क्रमशः अयोगी-अवस्था का व्यय होता है और फिर सिद्धतारूप कार्य उत्पन्न होता है। (6) स्व-गुण (अपने ज्ञानादि गुणों) का आधार शुद्ध आत्मद्रव्य ही है और शुद्ध आत्मतत्त्व को सत्ता का आधार है अथवा सत्ता का आधार शुद्ध आत्मतत्त्व है।

भवन भवन व्यय विण कारज नवि होवे रे, जिम द्रषदे न घटत्व;
शुद्धाधार शुद्धाधार स्वगुणनो द्रव्य छे रे, सत्ताधार सुतत्त्व     ।।8।।
अर्थ 9 : मोक्ष-सिद्धतारूप का कर्ता मोक्षाभिलाषी आत्मा है और उसका प्रधान साधन श्री जिनेश्वर परमात्मा हैं। क्योंकि परमात्मा के दर्शन से मोक्ष (पूर्ण शुद्ध-स्वरूप) की रुचि पैदा होती है और वह मोक्ष की रुचि बढ़ने से आत्मा का सम्पूर्ण साम्राज्य प्रकट होता है।

आतम आतम कर्त्ता कार्य सिद्धता रे, तसु साधन जिनराज;
प्रभु दीठे प्रभु दीठे कारज रुचि उपजेरे, प्रगटे आत्म साम्राज    ।।9।।
अर्थ 10 : मोक्ष की रुचि उत्पन्न करने के लिए जगत् के ईश-जगत् के नाथ और देवों में चन्द्र समान निर्मल, ऐसे श्री जिनेश्वर परमात्मा का वंदन, नमन, सेवन, पूजन, स्मरण, स्त्वन और ध्यान करना चाहिए। जिससें आत्मा में रहा हुआ सम्पूर्ण सुख एवं अनन्त गुण का निधान प्रकट होता है।

वंदन वंदन नमन सेवन वली पूजना रे, समरण स्तवन वली ध्यान;
देवचंद्र देवचंद्र कीजे जिनराजनो रे, प्रगटे पूर्ण निधान     ।।10।।

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JAINAM JAYATI SHASHNAM

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Mallinath Jagnath Thaye Nirabad Devchandraji chovisi stavan 19

|| Mallinath Jagnath Thaye Nirabad Devchandraji LYRICS - JAIN STAVAN SONG ||
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 Mallinath Jagnath Thaye Nirabad स्तवन स्तवन सांग

जैन स्तवन


श्री मल्लिनाथ भगवान् स्तवन Devchandraji jain stavan
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||  मल्लिनाथ जगनाथ निराबाधना ||  


श्री मल्लिनाथ जिन स्तवन

मल्लिनाथ जगनाथ चरणयुग ध्याईये रे,  च.
शुद्धताम प्राग्भाव परम पद पाईये रे; प.
साधक कारक षट्क करे गुण साधना रे, क.
तेहिज शुद्ध सरूप, थाय निराबाधना रे     ।।था.1।।

कर्ता आतम द्रव्य, कार्यनिज सिद्धतारे, का.
उपादान परिणाम, प्रयुक्त ने करणता रे; प.
आतम संपद दान तेह संप्रदानता रे, ते.
दाता पात्रने देय, त्रिभाव अभेदता रे     ।।त्रि. 2।।

स्व पर विवेचन करण तेह अपादानथी रे, ते.
सकल पर्याय आधार संबंध आस्थानथी रे; स.
बाधक कारक भाव, अनादि निवारवो रे, अ.
साधकता अवलंबी, तेह समारवो रे     ।।ते. 3।।

शुद्धपणे पर्याय प्रवर्तन कार्यमें रे; ते.
कर्तादिक परिणाम ते आतम धर्ममें रे; ते
चेतन चेतन भाव करे समवेतमें रे, क.
सादि अनंतो काल, रहे निज खेतमें रे     ।।र. 4।।

पर कर्तृत्व स्वभाव करे तां लगी करे रे, क.
शुद्ध कार्य रुचि भास थये नवि आदरे रे; थ.
शुद्धात्म, निज कार्य रुचे कारक फिरे रे, रु.
तेहिज मूल स्वभाव, ग्रहे निज पद वरे रे     ।।ग्र. 5।।

कारण कारज रुप, अछे कारक दशा रे।। अछे.।।
वस्तु प्रगट पर्याय, एह मनमें वस्या रे ।। एह.।।
पण शुद्ध स्वरुप ध्यान, चेतनता ग्रह रे।। चेतनता.।।
तव निज साधकभाव सकल कारक लहे रे।।     ।।स. 6।।

माहरुं पूर्णानंद, प्रकट करवा भणी रे।। प्रकट.।।
पुष्टालंबन रुप, सेव प्रभुजी तणी रे ।। सेव।।
'देवचंद्र' जिनचंद्र, भक्ति मनमे धरो रे ।। भक्ति.।।
अव्याबाध अनंत, अक्षय पद आदरो रे    ।।अ. 7।।



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अर्थ 1 : जगत् के नाथ श्री मल्लिनाथ परमात्मा के पाद-पद्म का ध्यान करने से शुद्ध परमात्म पद का प्रादुर्भाव होता है। क्योंकि श्री अरिहन्त प्रभु की सेवा से साधक के छहों कारक ज्ञानादि गुणों की साधना करते हैं और आत्मा का पूर्ण शुद्ध स्वरूप प्रकट होने पर वे ही षट्कारक निराबाधरुप में परिणत होते हैं।

मल्लिनाथ जगनाथ चरणयुग ध्याईये रे,  च.
शुद्धताम  प्राग्भाव परम पद पाईये रे; प.
साधक कारक षट्क करे गुण साधना रे, क.
तेहिज शुद्ध सरूप, थाय निराबाधना रे     ।।था.1।।
अर्थ 2 : (1) कर्ता : आत्मद्रव्य आत्मशुद्धिरूप कार्य में प्रवृत्त हुआ। यह प्रथम कर्ता कारक है। (2) कार्य : स्वसिद्धता (ज्ञानादि सर्व गुणों की पूर्णतारूप) कार्य – यह दूसरा कार्य (कर्म) कारक है। (3) कारण : उपादानपरिणाम, तत्त्वरूचि, तत्त्वज्ञान, तत्त्वपरिणति-तत्त्वरमणता, ये उपादान-कारण है और अरिहन्तादि निमित्त कारण हैं, इनका प्रयोग करना यह तीसरा करण कारक है। (4) संप्रदान : आत्मसम्पत्ति का दान अर्थात् ज्ञान, दर्शन, चारित्र का दान आत्मा स्वयं अपने उत्तरोत्तर गुण को प्रकट करने के लिए करे, यह चौथा सम्प्रदान कारक है। यहाँ दाता आत्मा है, पात्र भी आत्मा है और देय आत्मगुण है। इस प्रकार तीनों की अभेदता है।

कर्ता आतम द्रव्य, कार्यनिज सिद्धतारे, का.
उपादान परिणाम, प्रयुक्त ने करणता रे; प.
आतम संपद दान तेह संप्रदानता रे, ते.
दाता पात्रने देय, त्रिभाव अभेदता रे     ।।त्रि. 2।।
अर्थ 3 : (5) अपादान : स्व-पर की विवेक करना। जैसे, ज्ञानादि आत्मगुण ‘स्व’ है और रागद्वेषादि ‘पर’ है। ऐसा विचारकर उनका विवेक करना यह पांचवां अपादान कारक है। (6) आधार : समग्र स्व-पर्याय का आधार आत्मा है। आत्मा का स्वपर्याय के साथ स्व-स्वामित्वादि संबंध है, उसका आस्थान-आधार क्षेत्र आत्मा है। यह छठा आधार कारक है। अनादि से बाधकभाव से (मिथ्यात्व-अविरति-कषायादि में) परिणत षट्कारक के चक्र को रोककर साधकता के आलम्बन द्वारा ‘स्वरूप-अनुयायी’ बनाना चाहिए। जिससे सिद्धता-मोक्षरूप स्वकार्य की सिद्धि हो।

स्व पर विवेचन करण तेह अपादानथी रे, ते.
सकल पर्याय आधार संबंध आस्थानथी रे; स.
बाधक कारक भाव, अनादि निवारवो रे, अ.
साधकता अवलंबी, तेह समारवो रे     ।।ते. 3।।
अर्थ 4 : अब सिद्ध अवस्था में षट्कारक-प्रवृत्ति किस प्रकार है? यह बताते हैं -(1) कर्ता : शुद्ध ज्ञान-दर्शनादि पर्यायों को जानने-देखनेरूप कार्य का अथवा उत्पाद-व्ययरूप से परिणमन का कर्ता शुद्ध आत्मा है। (2) कार्य : शुद्ध ज्ञानादि पर्यायों को जानने-देखने ते र्ता में प्रवचन होना यह कार्य कारक है। (3) करण : केवलज्ञानादि गुण करण कारक है। (4) संप्रदान : आत्म-गुणों का परस्पर सहायरूप दान अथवा लाभ, यह संप्रदान है। (5) अपादान : परभाव का त्याग अपादान कारक है। (6) अनन्त गुणों का आश्रय आत्मा है, यह आधार है। इस प्रकार पूर्ण शुद्ध आत्मदशा में कतादि षट्कारक का परिणमन स्व-स्वरूप में ही होता है। आत्मा समवाय संबंध से अपने में रहे हुए ज्ञानादि स्वकार्य का कर्ता है और इसीलिए सिद्ध परमात्मा सादि-अनन्तकाल तक असंख्यात प्रदेशरूप क्षेत्र में ही रहते हैं।

शुद्धपणे पर्याय प्रवर्तन कार्यमें रे; ते.
कर्तादिक परिणाम ते आतम धर्ममें रे; ते
चेतन चेतन भाव करे समवेतमें रे, क.
सादि अनंतो काल, रहे निज खेतमें रे     ।।र. 4।।
अर्थ 5 : यह जीव जब तक पर (पुद्गल) वस्तुओं को अपनी मानकर उनका भोग करता हैं तब तक ही उसे पर का कर्तृत्व (परकर्तापन) होता है। परंतु इस जीव को जब शुद्ध आत्मस्वरूप प्रकट करने की रूचि जाग्रत होती है, तब वह जीव पर-कर्तृत्व को स्वीकार नहीं करना अर्थात् मोक्षरूपी कार्य को करने की अभिलाषा होने पर, पर का कर्तृत्व उसमें नहीं रहता। शुद्धात्मस्वरूप की प्राप्तिरूप कार्य को करने की रुचि होने से कारकचक्र परिवर्तित हो जाता है और स्व-कार्य के अनुरूप वह अपने मूल स्वभाव को अर्थात् अपने अचल अखण्ड, अविनाशी आत्मस्वभाव को ग्रहण करता है। जिसके फलस्वरूप आत्मा अपने परमात्म-पद को प्राप्त करता है।

पर कर्तृत्व स्वभाव करे तां लगी करे रे, क.
शुद्ध कार्य रुचि भास थये नवि आदरे रे; थ.
शुद्धात्म, निज कार्य रुचे कारक फिरे रे, रु.
तेहिज मूल स्वभाव, ग्रहे निज पद वरे रे     ।।ग्र. 5।।
अर्थ 6 : षट्कारक क्या है? कर्तादि छहों कारकों की अवस्था का विचार करने से ज्ञात होता है कि कारक, कारण और कार्यरूप है। क्योंकि, वे कार्य को सिद्ध करने के साधन हैं और वे वस्तु (आत्मा) के प्रकट निरावरण पर्याय हैं। यह शास्त्रवचन मन में रहा हुआ है, परन्तु जब निराकार या साकार चेतना शुद्ध आत्मस्वरूप के ध्यान में लीन होती है तब कर्तादि छहों कारक परभाव को छोड़कर निज साधकभाव को प्राप्त करती हैं। कर्म का विदारण करना और स्वरूप को प्रकट करना, यही कारक का साधक स्वभाव है।

कारण कारज रुप, अछे कारक दशा रे।। अछे.।।
वस्तु प्रगट पर्याय, एह मनमें वस्या रे ।। एह.।।
पण शुद्ध स्वरुप ध्यान, चेतनता ग्रह रे।। चेतनता.।।
तव निज साधकभाव सकल कारक लहे रे।।     ।।स. 6।।
अर्थ 7 : इस प्रकार श्री अरिहन्त परमात्मा के दर्शन, पूजा और सेवा से छहों कारकों का वाधकभाव मिटकर साधकभाव हो जाने से क्रमशः पूर्णानन्द स्वरूप की प्राप्ति होती है। अतः मेरे पूर्णानन्द अव्याबाध सुख को प्रकट करने में पुष्ट (नियामक) निमित्त-आलंबनरूप श्री अरिहन्त प्रभु की सेवा (आज्ञापालन) ही है। अतः देवों में चन्द्र के समान निर्मल ऐसे जिनेश्वर परमात्मा की परम भक्ति को हृदय में धारण करो और अव्याबाध (परभाव की पीड़ा-रहितः, अनन्त, अक्षय पद को प्राप्त करो। जिन भक्ति ही सारी साधनाओं का सार है।

माहरुं पूर्णानंद, प्रकट करवा भणी रे।। प्रकट.।।
पुष्टालंबन रुप, सेव प्रभुजी तणी रे ।। सेव।।
'देवचंद्र' जिनचंद्र, भक्ति मनमे धरो रे ।। भक्ति.।।
अव्याबाध अनंत, अक्षय पद आदरो रे    ।।अ. 7।।

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shri Arnath shivpur sath kharori,Devchandra chovishi 18 श्री अरनाथ भगवानना स्तवन

|| प्रणमो श्री अरनाथ, शिवपुर साथखरोरी LYRICS - JAIN STAVAN SONG ||
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 shri Arnath shivpur sath kharori,Devchandra chovishi
 स्तवन स्तवन सांग जैन स्तवन

 श्री अरनाथ भगवानना स्तवन Devchandraji jain stavan

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||  श्री अरनाथ भगवानना स्तवन ||  


प्रणमो श्री अरनाथ, शिवपुर साथखरोरी;
त्रिभुवन जन आधार, भवनिस्तार करोरी     ।।1।।
 
प्रणमो श्री अरनाथ, शिवपुर साथखरोरी;
त्रिभुवन जन आधार, भवनिस्तार करोरी     ।।1।।
 
कर्ता कारण योग, कारज सिद्धि लहेरी;
कारण चार अनूप, कार्यार्थी तेह ग्रहेरी    ।।2।।
 
जे कारण ते कार्य, थाये पूर्ण पदेरी;
उपादान ते हेतु, माटी घट ते वदेरी     ।।3।।
 
उपादानथी भिन्न, जे विणु कार्य न थाये;
न हुवे कारज रूप, कर्त्ताने व्यवसाये     ।।4।।

कारण तेह निमित्त, चक्रादिक घट भावे,
कार्य तथा समवाय, कारण नियतने दावे     ।।5।।
 
वस्तु अभेद स्वरूप, कार्यपणुं न ग्रहेरी;
ते असाधारण हेतु कुंभे थास लहेरी     ।।6।।
 
जेहनो न व्यापार, भिन्न नियत बहु भावी;
भूमि काल आकाश, घट कारण सद्भावी     ।।7।।
 
एह अपेक्षा हेतु, आगममांहि कह्योरी;
कारण पद उत्पन्न, कार्य थये न लह्योरी     ।।8।।
 
कर्ता आतम द्रव्य, कार्य सिद्धिपणोरी;
निज सत्तागत धर्म, ते उपादान गणोरी     ।।9।।
 
योग समाधि विधान, असाधारण तेह वदेरी;
विधि आचरणा भक्ति, जिणे निज कार्य सधेरी     ।।10।।
 
नर गति पढम संघयण, तेह अपेक्षा जाणो;
निमित्ताश्रित उपादान, तेहने लेखे आणो    ।।11।।
 
निमित्त हेतु जिनराज, समता अमृत खाणी;
प्रभु अवलंबन सिद्धि, नियमा एह वखाणी    ।।12।।
 
पुष्ट हेतु अरनाथ, तेहने गुणथी हलीयें;
रीझ भक्ति बहुमान, भोग ध्यानथी मलीयें    ।।13।।
 
मोटाने उत्संग बेठाने सी चिंता;
तिम प्रभु चरण पसाय, सेवक थया निचिंता    ।।14।।
 
अर प्रभु प्रभुता रंग, अंतर शक्ति विकासी;
'देवचंद्र' ने आनंद, अक्षय भोग विलासी    ।।15।।


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अर्थ 1-2 : करूणा के भण्डार, जगत् के नाथ श्री कंथुनाथ भगवान् समवसरण में विराजमान होकर बारह प्रकार की पर्षदा के समक्ष वस्तु-स्वरूप जीवाजीवादि तत्त्वों के मूल स्वरूप को प्रकाशित करते हैं। हे प्रभो ! आपके मुख की निर्मलवाणी जो अपने कानों से सुनते हैं, वे धन्य है क्योंकि वे लोग सफल गुणरत्नों की खान बनते हैं-सर्वगुणसम्पन्न बनते हैं।

समवसरण बेसी करी रे, बारह पर्षद मांहे;
वस्तु स्वरूप प्रकाशता रे, करुणाकर जगनाहो रे।।
कुंथु जिनेसरू।।    ।।1।।
निरमल तुज मुख वाणी रे;
जे श्रवणे सुणे, तेहिज गुण मणि खाणी रे     ।।कुंथु 2।।
अर्थ 3 : जिनवाणी से मोक्षमार्ग का संपूर्ण प्रकाश जगत् में फैलता है क्योंकि जिनेश्वर देव सब पदार्थों के, सर्व पर्यायों को केवलज्ञान द्वारा जानकर जीवों के हित के लिए उपदेश देते हैं। उनकी देशना में प्रकाशित मुख्य मुद्दे इस प्रकार हैं – (1) वस्तु में रहे हुए गुणपर्याय एवं स्वभाव की अनंतना के स्वरूप का वर्णन। (2) नय (3) गम (4) भंग (5) निक्षेप के स्वरूप का वर्णन। तथा. (6) नयादि के अगाध स्वरूप का हेय (त्याग करने योग्य), उपादेय (ग्रहण करने योग्य) के विभाग के रूप में प्रतिपादन।

गुण पर्याय अनंतता रे, वली स्वभाव अगाह;
नय गम भंग निक्षेपना रे, हेया देय प्रवाहो रे     ।।कुंथु 3।।
अर्थ 4 : श्री कुंथुनाथ प्रभु की देशना में – (1) मोक्ष के सब साधनों का (मोक्ष के मुख्य साधन जिनदर्शन, पूजन, मुनिवंदन, अनुकम्पा से लेकर शुक्लध्यानपर्यंत की भूमिका तय है।) (2) मोक्ष के सर्व साधकों का (मार्गनुसारी से लेकर क्षीणमोह और अयोगी-केवली तक के मोक्षसाधकों का क्रम इस प्रकार है – मार्गानुसारी सम्यक्त्व को ध्येय में रखकर साधना करता है, सम्यग्दृष्टि देशविरति को, देशविरति सर्वविरति को, सर्वविरति शुक्लध्यानी को, शुक्लध्यानी क्षायिकज्ञानादि को और क्षायिक-गुणी सिद्ध-अवस्था को ध्येय में रखकर साधना करता है।) और, (3) मोक्ष को प्राप्त सिद्ध भगवन्तो के स्वरूप का वर्णन होता है। जिनवचन में गौणता और मुख्यता होती है। प्रभु का केवलज्ञान तो समग्र ज्ञेय को जानने में समर्थ है अतः उसमें गौणता या मुख्यता का विचार नहीं है परंतु वचन क्रमबद्ध होने के कारण प्रस्तुत में उपयोगी विवक्षित-धर्म को मुख्यरूप से और शेष अविवक्षित धर्मों को गौण रूप से कहा जाता है।

कुंथुनाथप्रभु देशना रे, साधन साधक सिद्ध;
गौण मुख्यता वचनमां रे, ज्ञान ते सकल समृद्धो रे     ।।कुंथु 4।।
अर्थ 5 : जीवादि सब पदार्थ अनन्त धर्म (स्वभाव) युक्त होते हैं अतः उन पदार्थो के जीव-आदि ना भी उसमें रहे हुए अनंत धर्मों को बताते हैं। (जीव – इस शब्दोच्चार मात्र से भी उसके अनन्त धर्मों का कथन हो जाता है।) तथापि, केवलज्ञानी भगवंत अवसर देखकर श्रोता के बोध (जानने की योग्यता) के अनुसार अर्पित-वचन कहते हैं अर्थात् प्रयोजनवश विवक्षित वचन कहते हैं। (वस्तु में रहे हुए अनेक धर्मों में से जिस धर्म को कहने का प्रयोजन हो उस समय उस धर्म को विवक्षितकर ग्रहण करना या कहना – यह अर्पित कहा जाता है। प्रयोजन के अभाव में जिसकी विवक्षा नहीं है – वह अनर्पित कहा जाता है।)

वस्तु अनंत स्वभाव छे रे, अनंत कथक तसु नाम;
ग्राहक अवसर बोधथी रे, कहवे अर्पित कामो रे     ।।कुंथु 5।।
अर्थ 6 : छद्मस्थ जीवों को शेष अनर्पित धर्मों (विवक्षित धर्म से शेष रहे धर्मों) की सापेक्षरूप से श्रद्धा रखनी चाहिए और सापेक्षरूप से ज्ञान करना चाहिए। जब केवल ज्ञान प्रकट होता है तब अर्पित और अनर्पित-उभय रहित बोध होता है क्योंकि केवलज्ञान सब धर्मों को समकाल में जान लेता हैं।

शेष अनर्पित धर्मने रे, सापेक्ष श्रद्धा बोध;
उभय रहित भासन होवे रे, प्रगटे केवल बोधो रे     ।।कुंथु 6।।
अर्थ 7 : परमात्मा प्रभु की प्रभुता का तात्त्विक स्वरूप जैसे जैसे जिनवाणी द्वारा सुनने-समझने को मिलता है वैसे वैसे भव्य जीवों के हृदय अपूर्व आनंद, आश्चर्य और हर्ष से नाच उठते हैं। हे प्रभो ! आप में एक ही समय में अनन्त गुण पर्याय की छति (सत्ता) परिणति और वर्तना तथा उसके ज्ञान, भोग और आनन्द रहे हुए हैं। इसी तरह रम्य शुद्ध स्वरूप में रमण करनेवाले आप अनन्त गुण के समूह हैं।

छति परिणति गुण वर्तना रे, भासन भोग आनंद;
सम काले प्रभु ताहरे रे, रम्य रमण गुणवृंदो रे     ।।कुंथु 7।।
अर्थ 8 : स्व-स्वभाव (स्व-पर्याय की परिणति) की अपेक्षा से आत्मादि द्रव्य में स्यात् अस्तिता रही हुई है और पर-स्वभाव की अपेक्षा से स्यात् नास्तिता रही हुई है, वह पर-नास्तिता भी सत्रूप है। इसी तरह स्यात् अवक्तव्य (सीय उभय) स्वभाव भी रहा हुआ है। उपलक्षण से शेष भंग भी समझ लेने चाहिए।

निज भावे सिय अस्तिता रे, पर नास्तित्व स्वभाव;
अस्तिपणे ते नास्तिता रे, सीय ते उभय स्वभावो रे     ।।कुंथु 8।।
अर्थ 9 : मेरा जो सच्चिादानन्द अस्ति-स्वभाव है, वह अभी सत्तागत है, उसे प्रकट करने के लिए मैं वैराग्यसहित तीव्र रुचि (इच्छा) रखता हूँ और प्रभु के समक्ष बन्दन-नमन करके याचना करता हूँ कि, हे प्रभो ! आत्मा के लिए हितकारी ऐसा मेरा अस्ति-स्वभाव प्रकट करो।

अस्ति स्वभाव जे आपणो रे, रूचि वैराग्य समेत;
प्रभु सन्मुख वंदन करी रे, मागीश आतम हेतो रे      ।।कुंथु 9।।
अर्थ 10 : आत्मसत्तागत अनन्त ज्ञानादि स्वभाव की रुचि-अभिलाषा जागृत होने से उसी अस्ति-स्वभाव की अनन्तता का ध्यान करता हुआ साधक परमानन्द स्वरूप देवों में चन्द्र समान उज्वल परमात्म-पद को प्राप्त करता है।

अस्ति स्वभाव रुचि थयी रे, ध्यातो अस्ति स्वभाव;
देवचंद्र पद ते लहे रे, परमानंद जमावो रे     ।।कुंथु 10।।

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JAINAM JAYATI SHASHNAM

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17 Kunthunath Jinesaru Samvosaran besi Kunthu jineshwar Devchandra chovishi

|| कुंथु जिनेसरू Samvosaran besi Kunthu LYRICS - JAIN STAVAN SONG ||
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 Kunthunath Jinesaru Samvosaran besi स्तवन स्तवन सांग

जैन स्तवन


श्री कुंथुनाथ भगवान् स्तवन Devchandraji jain stavan

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 Kunthunath Jinesaru Samvosaran besi
कुंथु जिनेसरू



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||  कुंथु जिनेसरू ||  


समवसरण बेसी करी रे, बारह पर्षद मांहे;
वस्तु स्वरूप प्रकाशता रे, करुणाकर जगनाहो रे।।
कुंथु जिनेसरू।।    ।।1।।

निरमल तुज मुख वाणी रे;
जे श्रवणे सुणे, तेहिज गुण मणि खाणी रे     ।।कुंथु 2।।
 
गुण पर्याय अनंतता रे, वली स्वभाव अगाह;
नय गम भंग निक्षेपना रे, हेया देय प्रवाहो रे     ।।कुंथु 3।।
 
कुंथुनाथप्रभु देशना रे, साधन साधक सिद्ध;
गौण मुख्यता वचनमां रे, ज्ञान ते सकल समृद्धो रे     ।।कुंथु 4।।
 
वस्तु अनंत स्वभाव छे रे, अनंत कथक तसु नाम;
ग्राहक अवसर बोधथी रे, कहवे अर्पित कामो रे     ।।कुंथु 5।।
 
शेष अनर्पित धर्मने रे, सापेक्ष श्रद्धा बोध;
उभय रहित भासन होवे रे, प्रगटे केवल बोधो रे     ।।कुंथु 6।।
 
छति परिणति गुण वर्तना रे, भासन भोग आनंद;
सम काले प्रभु ताहरे रे, रम्य रमण गुणवृंदो रे     ।।कुंथु 7।।
 
निज भावे सिय अस्तिता रे, पर नास्तित्व स्वभाव;
अस्तिपणे ते नास्तिता रे, सीय ते उभय स्वभावो रे     ।।कुंथु 8।।
 
अस्ति स्वभाव जे आपणो रे, रूचि वैराग्य समेत;
प्रभु सन्मुख वंदन करी रे, मागीश आतम हेतो रे      ।।कुंथु 9।।
 
अस्ति स्वभाव रुचि थयी रे, ध्यातो अस्ति स्वभाव;
देवचंद्र पद ते लहे रे, परमानंद जमावो रे     ।।कुंथु 10।।


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अर्थ 1-2 : करूणा के भण्डार, जगत् के नाथ श्री कंथुनाथ भगवान् समवसरण में विराजमान होकर बारह प्रकार की पर्षदा के समक्ष वस्तु-स्वरूप जीवाजीवादि तत्त्वों के मूल स्वरूप को प्रकाशित करते हैं। हे प्रभो ! आपके मुख की निर्मलवाणी जो अपने कानों से सुनते हैं, वे धन्य है क्योंकि वे लोग सफल गुणरत्नों की खान बनते हैं-सर्वगुणसम्पन्न बनते हैं।

समवसरण बेसी करी रे, बारह पर्षद मांहे;
वस्तु स्वरूप प्रकाशता रे, करुणाकर जगनाहो रे।।
कुंथु जिनेसरू।।    ।।1।।
निरमल तुज मुख वाणी रे;
जे श्रवणे सुणे, तेहिज गुण मणि खाणी रे     ।।कुंथु 2।।
अर्थ 3 : जिनवाणी से मोक्षमार्ग का संपूर्ण प्रकाश जगत् में फैलता है क्योंकि जिनेश्वर देव सब पदार्थों के, सर्व पर्यायों को केवलज्ञान द्वारा जानकर जीवों के हित के लिए उपदेश देते हैं। उनकी देशना में प्रकाशित मुख्य मुद्दे इस प्रकार हैं – (1) वस्तु में रहे हुए गुणपर्याय एवं स्वभाव की अनंतना के स्वरूप का वर्णन। (2) नय (3) गम (4) भंग (5) निक्षेप के स्वरूप का वर्णन। तथा. (6) नयादि के अगाध स्वरूप का हेय (त्याग करने योग्य), उपादेय (ग्रहण करने योग्य) के विभाग के रूप में प्रतिपादन।

गुण पर्याय अनंतता रे, वली स्वभाव अगाह;
नय गम भंग निक्षेपना रे, हेया देय प्रवाहो रे     ।।कुंथु 3।।
अर्थ 4 : श्री कुंथुनाथ प्रभु की देशना में – (1) मोक्ष के सब साधनों का (मोक्ष के मुख्य साधन जिनदर्शन, पूजन, मुनिवंदन, अनुकम्पा से लेकर शुक्लध्यानपर्यंत की भूमिका तय है।) (2) मोक्ष के सर्व साधकों का (मार्गनुसारी से लेकर क्षीणमोह और अयोगी-केवली तक के मोक्षसाधकों का क्रम इस प्रकार है – मार्गानुसारी सम्यक्त्व को ध्येय में रखकर साधना करता है, सम्यग्दृष्टि देशविरति को, देशविरति सर्वविरति को, सर्वविरति शुक्लध्यानी को, शुक्लध्यानी क्षायिकज्ञानादि को और क्षायिक-गुणी सिद्ध-अवस्था को ध्येय में रखकर साधना करता है।) और, (3) मोक्ष को प्राप्त सिद्ध भगवन्तो के स्वरूप का वर्णन होता है। जिनवचन में गौणता और मुख्यता होती है। प्रभु का केवलज्ञान तो समग्र ज्ञेय को जानने में समर्थ है अतः उसमें गौणता या मुख्यता का विचार नहीं है परंतु वचन क्रमबद्ध होने के कारण प्रस्तुत में उपयोगी विवक्षित-धर्म को मुख्यरूप से और शेष अविवक्षित धर्मों को गौण रूप से कहा जाता है।

कुंथुनाथप्रभु देशना रे, साधन साधक सिद्ध;
गौण मुख्यता वचनमां रे, ज्ञान ते सकल समृद्धो रे     ।।कुंथु 4।।
अर्थ 5 : जीवादि सब पदार्थ अनन्त धर्म (स्वभाव) युक्त होते हैं अतः उन पदार्थो के जीव-आदि ना भी उसमें रहे हुए अनंत धर्मों को बताते हैं। (जीव – इस शब्दोच्चार मात्र से भी उसके अनन्त धर्मों का कथन हो जाता है।) तथापि, केवलज्ञानी भगवंत अवसर देखकर श्रोता के बोध (जानने की योग्यता) के अनुसार अर्पित-वचन कहते हैं अर्थात् प्रयोजनवश विवक्षित वचन कहते हैं। (वस्तु में रहे हुए अनेक धर्मों में से जिस धर्म को कहने का प्रयोजन हो उस समय उस धर्म को विवक्षितकर ग्रहण करना या कहना – यह अर्पित कहा जाता है। प्रयोजन के अभाव में जिसकी विवक्षा नहीं है – वह अनर्पित कहा जाता है।)

वस्तु अनंत स्वभाव छे रे, अनंत कथक तसु नाम;
ग्राहक अवसर बोधथी रे, कहवे अर्पित कामो रे     ।।कुंथु 5।।
अर्थ 6 : छद्मस्थ जीवों को शेष अनर्पित धर्मों (विवक्षित धर्म से शेष रहे धर्मों) की सापेक्षरूप से श्रद्धा रखनी चाहिए और सापेक्षरूप से ज्ञान करना चाहिए। जब केवल ज्ञान प्रकट होता है तब अर्पित और अनर्पित-उभय रहित बोध होता है क्योंकि केवलज्ञान सब धर्मों को समकाल में जान लेता हैं।

शेष अनर्पित धर्मने रे, सापेक्ष श्रद्धा बोध;
उभय रहित भासन होवे रे, प्रगटे केवल बोधो रे     ।।कुंथु 6।।
अर्थ 7 : परमात्मा प्रभु की प्रभुता का तात्त्विक स्वरूप जैसे जैसे जिनवाणी द्वारा सुनने-समझने को मिलता है वैसे वैसे भव्य जीवों के हृदय अपूर्व आनंद, आश्चर्य और हर्ष से नाच उठते हैं। हे प्रभो ! आप में एक ही समय में अनन्त गुण पर्याय की छति (सत्ता) परिणति और वर्तना तथा उसके ज्ञान, भोग और आनन्द रहे हुए हैं। इसी तरह रम्य शुद्ध स्वरूप में रमण करनेवाले आप अनन्त गुण के समूह हैं।

छति परिणति गुण वर्तना रे, भासन भोग आनंद;
सम काले प्रभु ताहरे रे, रम्य रमण गुणवृंदो रे     ।।कुंथु 7।।
अर्थ 8 : स्व-स्वभाव (स्व-पर्याय की परिणति) की अपेक्षा से आत्मादि द्रव्य में स्यात् अस्तिता रही हुई है और पर-स्वभाव की अपेक्षा से स्यात् नास्तिता रही हुई है, वह पर-नास्तिता भी सत्रूप है। इसी तरह स्यात् अवक्तव्य (सीय उभय) स्वभाव भी रहा हुआ है। उपलक्षण से शेष भंग भी समझ लेने चाहिए।

निज भावे सिय अस्तिता रे, पर नास्तित्व स्वभाव;
अस्तिपणे ते नास्तिता रे, सीय ते उभय स्वभावो रे     ।।कुंथु 8।।
अर्थ 9 : मेरा जो सच्चिादानन्द अस्ति-स्वभाव है, वह अभी सत्तागत है, उसे प्रकट करने के लिए मैं वैराग्यसहित तीव्र रुचि (इच्छा) रखता हूँ और प्रभु के समक्ष बन्दन-नमन करके याचना करता हूँ कि, हे प्रभो ! आत्मा के लिए हितकारी ऐसा मेरा अस्ति-स्वभाव प्रकट करो।

अस्ति स्वभाव जे आपणो रे, रूचि वैराग्य समेत;
प्रभु सन्मुख वंदन करी रे, मागीश आतम हेतो रे      ।।कुंथु 9।।
अर्थ 10 : आत्मसत्तागत अनन्त ज्ञानादि स्वभाव की रुचि-अभिलाषा जागृत होने से उसी अस्ति-स्वभाव की अनन्तता का ध्यान करता हुआ साधक परमानन्द स्वरूप देवों में चन्द्र समान उज्वल परमात्म-पद को प्राप्त करता है।

अस्ति स्वभाव रुचि थयी रे, ध्यातो अस्ति स्वभाव;
देवचंद्र पद ते लहे रे, परमानंद जमावो रे     ।।कुंथु 10।।

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