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Sunday, September 15, 2019

ASTH PRATIHARYA STUTI अष्ट प्रातिहार्य

||ASTHA PRATIHARYA STUTI ||
अष्ट प्रातिहार्य
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जैन स्तवन भजन - JAIN STAVAN SONG ||
|| ASTHA PRATIHARYA LYRICS||

अष्ट प्रातिहार्यजैन स्तवन 

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प्रातिहार्य आठ कहे गये हैं। ये प्रातिहारों की तरह तीर्थंकरों के साथ सदैव रहने के कारण प्रातिहार्य कहलाते हैं। अष्ट महाप्रातिहार्य इस प्रकार हैं-
1 - अशोक वृक्ष
2 - सिंहासन
3 - भामंडल
4 - तीन छत्र
5 - चमर
6 - सुयरपुष्पवृष्टि
7 - दुन्दुभि
8 - दिव्यध्वनि।

1 अशोक वृक्ष - समवशरण में विराजित तीर्थंकर परमात्मा के सिंहासन पर अशोक वृक्ष शोभायमान होता है। यह वृक्ष वनस्पतिकायिक न होकर पार्थिव और देव रचित होता है। शोकरहित, तीर्थंकर के मस्तक पर रहने के कारण यह अशोक वृक्ष कहलाता है। तीर्थंकरों का सान्निध्य पाने वाले सभी जीव शोकरहित हो जाते हैं। अशोक वृक्ष यही संदेश है।

तीर्थंकर भगवन्त जिन-जिन वृक्षों के नीचे दीक्षा धारण करते हैं, वही उनका अशोक वृक्ष होता है। चैबीस तीर्थंकरों के अशोक वृक्ष अलग-अलग हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं - न्यग्रोध/वट, सप्तपर्ण, शाल/साल, सरल/चीड़, प्रियंगु, प्रियंगु, शिरीष, नागवृक्ष!नागकेशर, शाल, अक्ष/बहेडा, धूलीपलाश/पलाश, तेंदू, पाटल/कदम, पीपल, दधिपर्ण/कैंथ, नन्दी, तिलक, आम्र, अशोक, चंपक/चम्पा, वकुल/मौलश्री, मेषश्रृंग/गुड़मार, धव/धौ और शाल ये चैबीस वृक्ष क्रमशः चैबीस तीर्थंकरों के अशोक वृक्ष हैं। इनकी ऊंचाई अपने-अपने तीर्थंकरों की ऊंचाई से बारह गुणी होती है।

वृक्ष सहिष्णुता का प्रतीक है। वह सर्दी, गर्मी, बरसात तथा प्राकृतिक प्रकोपों को प्रतीकार रहित होकर सहता है, तभी उसमंे फूल और फल लगते हैं। मनुष्य भी जब वृक्ष की तरह सब प्रकार की बाधाओं को प्रतीकार रहित सहन करता है, तभी उसमें केवल्य का फल लगता है। भगवान् के मस्तक पर अवस्थित अशोक वृक्ष संभवतः यही संदेश देता है।

2 सिंहासन - समवशरण के मध्य स्थित रत्नमयी तीन पीठिाकओं के ऊपर चार सिंहासन होते हैं इनमें एक पर तीर्थंकर भगवन्त स्वयं विराजते हैं और शेष तीन पर परमात्मा के तीन प्रतिरूप रहते हैं। यह सिंहसन उत्तम रत्नों से रचित होता है तथा विकट दाढ़ों से युक्त विकराल सिंह-जैसी आकृति पर प्रतिष्ठित होता है। सिंहासन के ऊपर एक सहस्त्रदल कमल होता है। भगवान् उससे चार अंगुल ऊपर अधर में विराजमान रहते हैं।

3 भामंडल - घातिया कर्मों के क्षय के बाद भगवान् के मस्तक के चारों ओर परमात्मा के शरीर को उल्लसित/उद्योतित करने वाला अति सुन्दर, अनेक सूर्यों से भी अत्यधिक तेजस्वी और मनोहर भामंडल होता है। इसकी तेजस्विता तीनों जगत् के द्युतिमान् पदार्थों की द्युति का तिरस्कार करती है।
ओक्यूल्ट साईंस के अनुसार ‘‘भा-मण्डल’’ (हलो) यह महान् व्यक्तियों के सिर के पीछे गोलाकर में पीले रंग के चक्र जैसा होता है। तीर्थंकरों का प्रभावलय उनकी परम औदरिक अनुपम देह से निकलती हुई, कैवल्य रश्मियों का वर्तुलाकार मंडल है। उनकी दिव्यप्रभा के आगे कोटि-कोटि सूर्यों का प्रभाव भी हतप्रभ हो जाता है। सामान्य व्यक्तियों के पीछे पायी जानेवाली भावधाारा को आभामण्डल (ओरा) कहते हैं। यह सबल और निर्बल दो प्रकार का होता है। जिनका चरित्र अच्छा हो, आत्मबल अधिक हो, उनका आभामण्डल सबल और जिनकी नैतिक भावधारा हीन हो, उनका आभामण्डल निर्बल होता है। यह व्यक्ति की भावधारा का प्रतीक है।

सामान्य व्यक्तियों का आभामंडल परिवर्तनशील होता है। बाह्य तत्वों के प्रभाव से उनकी भावधारा सदैव बदलती रहती है, जबकि असामान्य और निर्मल भावधारावाले व्यक्तियोंपर अशुद्ध वायुमंडल का प्रभाव नहीं पड़ता। यह अपने - आप में इतना सशक्त होता है कि अन्य भावधारा से प्रभावित नहीं होता, बल्कि यह अधिक बलवान् होकर अन्यों को अपने से प्रभावित भी करता है। यही कारण है कि महापुरूषों का सान्निध्य हमें अपनी तरंगों से प्रभावित कर प्रसन्नता प्रदान करता है। इससे निकलनेवाली तेजस रश्मियां अलौकिक और शान्त होती हैं।

तीर्थंकरों के भामण्उल की प्रतिच्छाया में भव्यात्मा अपने अतीत के तीन भव, एक वर्तमान तीन भव इस प्रकार सात भवों को देख सकता है।

4 तीन छत्र - भगवान् केमस्तक पर रत्नमय तीन छत्र शोभायमान रहते हैं। ये तीनों छत्र तीनों लोकों के साम्राज्य को सूचित करते हैं। ये छत्र शरद ऋतु के चन्द्र के समान श्वेत, कुन्द और कुमुद - जैसे अत्यन्त शुभ्र और लटकती हुई मालाओं की पंक्तियों के समान अत्यन्त धवल एवं मनोरम होते हैं। तीनों छत्र ऊपर से नीचे की ओर विस्तारयुक्त होते हैं।

5 चमर - भगवान् के दोनों ओर सुन्दर सुसज्जित देवों द्वारा चैसठ चमर ढोरे जाते हैं। ये चमर कमलनालों के सुन्दर तंतु जैसे स्वच्छ, उज्जवल, ओर सुन्दर आकारवाले होते हैं। चमर में रहे रेशे इतने श्वेत एवं तेजस्वी होते हैं कि उनमें से चारों ओर किरणें निकलती हैं। इण्ड उत्तम रत्नों से रचित एवं स्वर्णमय होते हैं। ढोरे (बीजें) जाते हुए ये चमर ऐसे प्रतीत होते हैं मानो, इन्द्र धनुष नृत्य कर रहे हो। ये नमन और उन्नमन द्वारा सूचित करते हैं कि प्रभु को नमस्कार करने से सज्जन उच्च गति को प्राप्त होते हैं।

चमर ढोरने के सम्बंध में आचार्य मानतुंग कहते हैं- ‘‘हे परमात्मा! आपका स्वर्णिम देह ढुरते हुए चमरों से उसी भांति शोभा दे रहा है, जैसे स्वर्णमय सुमेरू पर्वत पर दो निर्मल जल के झरने झर रहे हों

6 पुष्प-वृष्टि - भगवान्् के मस्तक पर आकाश से सुगन्धित जल की बूंदों से युक्त एवं सुखद, मन्दार, सुन्दर, नमेरू, पारिजात तथा सन्तानक आदि उत्तम वृक्षों के ऊध्र्वमुखी दिव्य फूलों की वर्षा होती रहती है। पुष्पवर्षा की सुरम्यता का चित्रण करते हुए आचार्य मानतुंग कहते हैं कि भगवन्! ये पुष्पों की पंक्ति ऐसी प्रतीत होती है, मानों आपके वचनों की पंक्ति ही फैल रही हो।’’

7 देव-दुन्दुभि - तीर्थंकर के सान्निध्य में ऊपर आकाश में भुवनव्यापी दुन्दुपी दुन्दुभि ध्वनि होती है। दुन्दुभिनाद सुनते ही आबाल वृद्धजनों को अपार आनंद का अनुभव होता है और देवाधिदेव अरिहन्त प्रभु के आगमन की सूचना भी सर्वजनों को एक साथ मिलती है। जगत् के सर्वप्राणियों को उत्तम पदार्थ प्रदान करने में यह दुन्दुभि समर्थ है। यह सर्द्धमराज अर्थात् परम उद्धारक तीर्थंकर भगवान् की समस्त संसार में जयघोष कर सुवश प्रकट करती है।
यह दिव्य देव-दुन्दुभि देवों के हस्त तल से ताडि़त अथवा स्वयं शब्द करनेवाली होती है। यह स्वयं के गम्भीर नाद से समस्त अन्तराल को प्रतिध्वनित करती है।

दुन्दुभि जयगान का प्रतीक है। यह तीर्थंकर भगवन्त के धर्मराज्य की घोषणा प्रकट करती है और आकाश में भगवान् के सुयश को सूचित करती है। यह विजय का भी प्रतीक है। संपूर्ण विश्व को जीतनेवाले महान योद्धा मोह राजा को, अरिहन्त भगवान् ने शीघ्र ही जीत लिया है, ऐसा सूचित करता हुआ दुन्दुभिनाद सर्व जीवों के सर्वभयों को एक साथ दूर करता है।

8 दिव्य-ध्वनि - दिव्य - ध्वनि मृदु, मनोहर, अतिगंभीर और एक योजन प्रमाण समवशरण में विद्यमान देव, मनुष्य और तिर्यंच आदि सभी संज्ञी पंचेद्रिय जीवों को एक साथ प्रतिबोधित करने वाली होती है। जैसे मेघ का जल एकरूप होते हुए भी नाना वनस्पतियों में जाकर नानारूप परिणत हो जाता है, उसी तरह दनत, तालु, ओष्ठ आदि के स्पन्दन से रहित भगवान् की वाणी अट्ठारह महाभाषा और सात सौ लघुभाषा रूप परिणत होकर एक साथ समस्त भव्य जीवों को आनन्द प्रदान करती है। इसलिए भगवान् की वाणी को सर्व भाषा-स्वभावी कहते हैं।

तीर्थंकरों की दिव्यध्वनि मागध जाति के व्यंतर देवों के निमित्त से सर्वजीवों को भले प्रकार से सुनाई पड़ती है। जैसे आजकल ध्वनि विस्तारक यंत्रों द्वारा ध्वनि को दूर तक पहुंचाया जाता है, वही काम मागध देवों का है। वे भगवान् की वाणी को एक योजन तक फैलाकर उसे सर्वभाषात्मकरूप परिणमा देते हैं। जैसे आजक राष्ट्रपति भवन एवं संसद भवन आदि में एक ही भाषा में बोले गये शब्द अनेक भाषारूप में सुने जा सकते हैं, वैसे ही मागध जाति के देवों के निमित्त से संज्ञी जीव भगवान् की वाणी को अपनी-अपनी भाषा में समझ लेते हैं। भगवान् की वाणी दिन में चार बार छह-छह घड़ी (दो घण्टे चैबीस मिनट) तक खिरती है।

इस प्रकर अष्टमहाप्रातिहार्यों से संयुक्त परमात्मा अद्भुत महिमावाले होते हैं।

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मातुश्री पवनिदेवी अमीचंदजी खाटेड़ संघवी || राजस्थान : करडा
MATUSHREE PAVANIDEVI AMICHANDJI KHATED SANGHVI 

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Friday, August 10, 2012

JAIN STUTI (PRAYERS) JENA GUNO NEH VARNAWA

JAIN STUTI (PRAYERS)DARSHANAM DEVADEVASYA DARSHANAM

The vision and reflection of the Tirthankar’s idol is the destroyer of all sins. It is a step towards The heavens, and is a 
means to the liberation of the soul.



MANGALAM BHAGAVANA VIRO

Bhagawan Mahavir is auspicious,
 Ganadhar Gautam Swami is auspicious;
 Achärya Sthulibhadra is auspicious; 
Jain religion is auspicious.

ADIMAM PRTHIVINATHA

We adore Lord Rushabhadev who was the first king, who was the first to renounce all his possessions (everything) and who was the first Tirthankar

ARHANTO BHAGAVANTA INDRAMAHITAH

The Omniscients who have been worshipped by heavenly gods; 
the liberated souls, who are Siddhas;
 the heads of the religious order, who reinforce the fourfold order established by theJinas; 
the revered Upadhyays, well versed in the scriptures and
the Saints who are followers of true path of liberation(three jewels); may all these five auspicious entities bestow blessings everyday

KHAMEMI SAVVAJIVE
"I forgive all living beings (who may have caused me any pain and suffering either in this life or previous lives), and I beg   for the forgiveness from all living beings (no matter how small or big to whom I may have caused pain and suffering , knowingly or unknowingly, mentally, verbally or physically, or if I have asked or encouraged someone else to carry out such activities).I have a friendship with everybody and I have no revenge (animosity or enmity) toward anybody."

I forgive all souls; let all souls forgive me. I am on friendly terms with all; I have no animosity towards anyone.

SHIVAMASTU SARVAJAGATAH

May the entire universe attain bliss; 
may all beings be oriented to the interest of others;
 let all faults be eliminated; 
and may people be happy everywhere


TUBHYAM NAMASTRIBHUVANARTIHARAYA NATHA

Lord, I bow to you,the eradicator of misery of the three worlds;
I bow to you the adorable ornament on the face of the earth;
 I bow to you, the Lord of the three worlds; omniscient Lord;
I bow to you, the destroyer of the sea of the life cycle.


UPASARGAH KSAYAM YANTI

All the troubles disintegrate, the shackles of obstacles break, the mind achieves a blissful state wherever and whenever the
Lord Jineshvars are worshipped.


VIRAH SARVASURASURENDRA MAHITO


Lord Mahavir is worshipped by all heavenly gods as well as demons; the learned take refuge in Lord Mahavir, who has
destroyed all his karma; I always bow to Lord Mahavir. This unparalleled Tirtha of Jain religion has been set up by Lord Mahavir;
Lord Mahavir’s austerities were intense; collections of enlightenment (Shri means wealth, here wealth of knowledge), patience,
glory, and grace rest in Vir; Oh Lord Mahavir, show me the path to attain liberation.

Aavyo Sharne Tamara, Jinavara Karjo,
Aash Puri Amari, Navyo Bhavapar Maro,
Tuma Vina Jag Ma, Saar Le Kon Maari,
Gaayo Jinaraaj! Aaje Haraka Adhikathi, Param Aanandkari,
Payo Tum Darsh Naashe, Bhava-Bhaya Brahmana, Naath! Sarve Amari ..1

Bhavo Bhava Tum Charno Ni Seva,
Hu Toh Maangu Chu Deva dhi deva;
Saamu Juo Ne Sevak Jaani,
Evi Uday Ratna Ni Vani    ..2

Jine Bhakti Jine Bhakti, Jine Bhakti Dine Dine,
Sada Mestu Sada Mestu, Sada Mestu Bhave-Bhave;
Upsarga Kshaya Yanti, Chighante Vighnavalaya,
Manah Prasnnatameti, Pujyamaane Jineshware    ...3

Je Drashti Prabhu Darshan Kare,
Te Drashti Ne Pan Dhanya Che,
Je Jibh Jinavara Ne Stave,
Te Jibh Ne Pan Dhanya Che,
Piye Mruda Vaani Sudha,
Te Karna Yugne Dhanya Che,
Tuj Naam Mantra Vishad Dhare,
Te Hraday Ne Pan Dhanya Che   ..4


JENA GUNO NEH VARNAWA SHRUT SAGARO OCHHA PADE
GAMBHIRTAH NEH MAPWA SAHU SAGARO OCHHA PADE
 JENI DHAVALTAH AAGADEH KSHIRSAGARO JHANKHA PADE
SHANKHESHWARA PRABHU PARSHWANE
BHAVE KARU HU VANDANA


  हे ! देव तारा दिलमा

हे देव तारा दिलमां छे, वास्तल्यानां झरना भर्या ।
हे नाथ तारा नयनमां करुणातना अमृत भर्या  ।
वीतराग तारी मीठी मीठी वाणिमां जादु भर्या ।
तथी ज तारा चरणमां, बालक बनी आवी रह्या ।।

क्यारे प्रभु छ काय जीवना वध थकी हु विरंना ।
क्यारे प्रभु रत्नत्रयी आराधना उज्ज्वल बनु ।
क्यारे प्रभु मन मुक्ती, समतारसमा लीन बनुं ।।
क्यारे प्रभु मद तुज भक्ती पामी, मुक्तिगामी हूं बनुं ।

जेना गुणोंना सिंधुना बे बिंदु पण जाणु नहीं ।
पण एक श्रद्धा दिलमां के नाथ सम को छे नहीं ।।
जेना सहारे क्रोध तरीया मुक्ति मुज निश्चय सही ।
ऐवा प्रभु अरिहंतने पंचाग भावे हूं नमु ।।

याचक थईने मांगू प्रभुजी, हे वीतरागी तारी कने ।
महाविदेह क्षेत्रमां जाऊ, श्री सिमंधर स्वामी कने ।।
आठ वरसनी वयमां प्रभुजी, चरित्र लई स्वामी बने ।
घाती अघाती कर्म खपावी, क्यारे पहुंचीश तारी कने ।।

हे त्रन भुवनना नाथ मारी कथनी जई कोने करूं ।
कागळ लख्यो पहुच्यो नही, पोकार जई कोने कहुं ।।
तू मोक्षनी मोझरमां, हु दुःख भर्या संसारमां ।
जरा सामु हु पण जुओं नही, तो वात जई कोने कहुं ।।

जेना स्मरणथी जिवनना, संकट बधा दुरे टेल ।
जेना स्मरणथी मनतणा, वांछित सहु आवी मळे
जेना स्मरणथी आधी व्याधी ने उपाधीनां टके ।
ऐवा श्री शंखेश्वर प्रभुनां, चरणोमां भावे हूं नमूं ।।

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JAINAM JAYATI SHASHNAM
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